प्रेम, वियोग और मौन

अयोध्या से दूर वन के उस निर्जन प्रदेश में जीवन धीरे-धीरे अपनी नई गति ग्रहण कर रहा था, किन्तु स्मृतियाँ अभी भी पीछे नहीं छूटी थीं। वे कभी शीतल पवन की तरह आतीं और कभी हृदय पर प्रहार करने वाली तीखी शूल बन जातीं।

उस दिन सांझ के समय राम एक विशाल शाल वृक्ष के नीचे बैठे थे। सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहा था। उसकी लालिमा वन की पत्तियों पर बिखर रही थी।

सीता कुछ दूरी पर बैठी उन्हें देख रही थीं। राम के चेहरे पर वही शान्ति थी जो सदैव रहती थी, किन्तु प्रेम की दृष्टि वहाँ भी देख लेती है जहाँ संसार कुछ नहीं देख पाता।

उन्होंने अनुभव किया कि राम आज कुछ अधिक मौन हैं। वह उनके समीप आकर बैठ गईं। कुछ देर दोनों मौन रहे। फिर सीता ने धीरे से पूछा—

“आर्यपुत्र! क्या स्मृतियाँ आज अधिक व्याकुल कर रही हैं?”

राम ने उनकी ओर देखा। हल्की मुस्कान आई।

“तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ?”

सता ने कहा, आपके मौन से।

राम कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले सीते! मनुष्य कितना भी धैर्यवान क्यों न हो, कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो भीतर कहीं गहराई में निवास करती हैं। आज पिताश्री की बहुत याद आ रही है।

सीता का हृदय भीग गया। उन्होंने पहली बार राम की आँखों में पुत्र का दुःख देखा। राजा का नहीं। अवतार का नहीं। केवल एक पुत्र का।

राम आगे बोले कि मैं जानता हूँ कि उन्होंने मुझे रोका नहीं क्योंकि वे धर्म से बँधे थे। किन्तु मैं यह भी जानता हूँ कि उनका हृदय टूट गया होगा। वन का वातावरण अचानक और गंभीर हो गया।

सीता ने धीरे से कहा वियोग मे सबसे बड़ा दुःख किस का होता है जानते हैं आर्यपुत्र?

क्या?

जब प्रेमी के पास आँसू भी न बचें।क्योंकि आँसू बहाकर मनुष्य अपना दुःख हल्का कर लेता है। किन्तु कुछ वियोग ऐसे होते हैं जो आँसू भी नहीं बनने देते। वे केवल हृदय में चुपचाप जलते रहते हैं।

राम उन्हें देखते रहे। उन्हें लगा जैसे सीता केवल उनके पिता का दुःख नहीं समझ रहीं, बल्कि स्वयं उस पीड़ा को जी रही हैं।

उसी समय अयोध्या में कौशल्या अपने कक्ष में बैठी थीं। रात्रि का दूसरा प्रहर था। राजमहल सो चुका था। किन्तु एक माँ की आँखों में नींद कहाँ थी?

वह राम का बाल्यकाल स्मरण कर रही थीं। वह पहला दिन जब राम ने चलना सीखा था। पहली बार जब उन्होंने उन्हें “माँ” कहकर पुकारा था। पहली बार जब उन्होंने धनुष उठाया था।

स्मृतियाँ मनुष्य को दो प्रकार से छूती हैं। एक बार वे सुख देती हैं। दूसरी बार वही स्मृतियाँ पीड़ा बन जाती हैं।

उस रात कौशल्या के लिए हर स्मृति पीड़ा थी। उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा कि हे प्रभु! यदि वनवास आवश्यक था तो मुझे भी साथ भेज देते। जिस पुत्र को जन्म दिया, आज वही मेरी आँखों से दूर है।

उस क्षण मातृत्व और धर्म का संघर्ष चल रहा था। माँ पुत्र को चाहती थी। धर्म उसे त्याग माँग रहा था और यही जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है।

मनुष्य अक्सर उन चीजों का त्याग करता है जिन्हें वह सबसे अधिक प्रेम करता है।

वन में लौटें तो उस रात सीता देर तक सो नहीं सकीं। राम और लक्ष्मण सो चुके थे। आकाश में असंख्य तारे थे।

उन्होंने ऊपर देखा। उन्हें स्मरण आया कि अयोध्या में भी आज यही आकाश होगा। मिथिला में भी यही आकाश होगा।

शायद माता सुनयना भी इसी आकाश को देख रही होंगी। शायद उर्मिला भी। शायद कौशल्या माता भी।

अचानक उन्हें अनुभव हुआ कि दूरी वास्तव में होती ही नहीं। दूरी केवल शरीरों के बीच होती है। हृदयों के बीच नहीं। जो प्रेम में जुड़ जाते हैं, वे कभी अलग नहीं होते।

उन्हें लगा कि आज भी माता कौशल्या का स्नेह उनके साथ है। जनक का आशीर्वाद उनके साथ है। उर्मिला की मौन तपस्या उनके साथ है और तब उन्हें समझ आया कि प्रेम का वास्तविक स्वरूप उपस्थिति नहीं, अनुभूति है। जो अनुभूत होता है, वह कभी दूर नहीं होता।

कुछ दिनों बाद एक आश्रम में एक वृद्ध ऋषि से भेंट हुई। उन्होंने राम, सीता और लक्ष्मण का स्वागत किया। रात्रि भोजन के बाद धर्म चर्चा प्रारम्भ हुई।

ऋषि ने सीता से पूछा। पुत्री! क्या तुम्हें कभी अपने निर्णय पर पछतावा हुआ? सीता मुस्करायीं और कहा कि नहीं।

ऋषि ने कहा कि क्यों?

सीता बोलीं क्योंकि मैंने कोई त्याग नहीं किया।

ऋषि चकित हुए और बोले वनवास को त्याग नहीं मानती?

सीता का उत्तर था नहीं। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि त्याग वह होता है जिसमें प्रिय वस्तु छूट जाए। किन्तु मेरी प्रिय वस्तु तो मेरे साथ है।

ऋषि ने पूछा— और वह क्या है?

सीता ने राम की ओर देखकर कहा, सत्य।

आश्रम में गहरा मौन छा गया। फिर उन्होंने आगे कहा कि लोग समझते हैं कि मैं अपने पति के साथ आई हूँ। किन्तु मैं केवल पति के साथ नहीं आई। मैं उस धर्म के साथ आई हूँ जिसके लिए वह चल रहे हैं। यदि राम अन्याय के मार्ग पर जाते, तो शायद मैं उन्हें रोकती। किन्तु वे धर्म के लिए चल रहे हैं और धर्म से बड़ा कोई संबंध नहीं।”

ऋषि की आँखें भर आईं।

उन्होंने कहा— पुत्री! तुमने आज पतिव्रत का वास्तविक अर्थ बता दिया।

समय बीत रहा था। वन वनवासी-जीवन मे शिक्षक बन चुका था। वहाँ कोई ग्रन्थ नहीं थे। कोई विश्वविद्यालय नहीं था। किन्तु प्रत्येक वृक्ष एक उपनिषद था।

प्रत्येक नदी एक दर्शन थी। प्रत्येक ऋतु एक शास्त्र थी।

एक दिन वर्षा हो रही थी। सीता कुटिया के बाहर खड़ी जलधारा को देख रही थीं। उन्होंने देखा कि वर्षा का जल ऊँचे स्थानों से नीचे की ओर बह रहा है। तभी उनके मन में एक विचार आया और उन्होंने राम से कहा कि आर्यपुत्र! क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जल सदैव नीचे की ओर ही क्यों जाता है?

राम मुस्कराए और कहा हाँ लेकिन सीते! ऐसा क्यों है? राम के इस प्रतिप्रश्न पर सीता बोलीं क्योंकि विनम्रता उसका स्वभाव है और इसी कारण वह जीवन देता है। जो ऊँचा बनना चाहता है, वह टूट जाता है। जो नीचे झुकता है, वही बड़ा बनता है। राम उन्हें देखते रहे। फिर बोले सीते! यही कारण है कि अहंकार मृत्यु है और विनम्रता जीवन।

वनवास धीरे-धीरे केवल बाहरी यात्रा नहीं रहा। वह तीनों के भीतर भी घट रहा था। लक्ष्मण सेवा सीख रहे थे। राम त्याग का विस्तार कर रहे थे और सीता प्रेम के दर्शन को जी रही थीं।

उन्हें अब समझ आने लगा था कि संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग नहीं है। सबसे बड़ा दुःख है प्रेम की अनुपस्थिति।

जिसके जीवन में प्रेम है, उसका वियोग भी पवित्र हो जाता है और जिसके जीवन में प्रेम नहीं है, उसका मिलन भी रिक्त रह जाता है।

एक दिन उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया— “यदि भविष्य में मुझे राम से भी वियोग सहना पड़े तो?” यह विचार आते ही उनका हृदय काँप उठा। किन्तु अगले ही क्षण भीतर से उत्तर आया— “प्रेम शरीर से नहीं जुड़ा। प्रेम आत्मा से जुड़ा है।” आत्माएँ अलग नहीं होतीं और उसी क्षण उन्हें लगा कि प्रेम मृत्यु से भी बड़ा है। समय से भी बड़ा है। दूरी से भी बड़ा है। क्योंकि प्रेम वस्तुतः आत्मा का स्वरूप है। जहाँ आत्मा है, वहाँ प्रेम है और जहाँ प्रेम है, वहाँ वियोग भी मिलन का ही एक रूप है।

रात्रि गहरा रही थी। वन शान्त था। दूर कहीं किसी पक्षी का स्वर सुनाई दे रहा था। सीता ने राम की ओर देखा और राम ने उनकी ओर। दोनों कुछ नहीं बोले। किन्तु उस मौन में जितना कहा गया, उतना शब्दों में कभी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कुछ सत्य शब्दों से नहीं, केवल अनुभूति से समझे जाते हैं।

उस रात वन के मध्य बैठी दो आत्माएँ उसी अनुभूति में डूबी थीं; जहाँ प्रेम धर्म बन जाता है। जहाँ समर्पण मुक्ति बन जाता है और जहाँ वियोग भी ईश्वर का दूसरा नाम प्रतीत होने लगता है।