डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
सुमन्त्र मौन थे। उनके हाथों में रथ की लगाम थी, पर मन की लगाम छूट चुकी थी। उनके सामने बैठी जनकनन्दिनी अब केवल महारानी नहीं रह गई थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं पृथ्वी अपने मुख से धर्म का रहस्य उद्घाटित कर रही हो।
कुछ क्षणों तक वन में केवल पत्तों की सरसराहट थी। दूर कहीं किसी शुक का स्वर सुनाई दिया। मंदाकिनी की धारा चट्टानों से टकराकर जैसे इस संवाद की साक्षी बन रही थी।
सीता ने धीरे-धीरे चारों ओर दृष्टि डाली। उनकी आँखों में करुणा थी, पर करुणा के भीतर अद्भुत स्थिरता थी। उन्होंने भूमि की ओर झुककर मुट्ठी भर मिट्टी उठाई। उस मिट्टी को अपने मस्तक से लगाया।
फिर बोलीं—
“तात! क्या आप जानते हैं कि इस मिट्टी में कितनी स्मृतियाँ सोती हैं?”
सुमन्त्र ने विस्मित होकर उनकी ओर देखा।
सीता बोलीं—
“मनुष्य केवल अपने घरों को पहचानता है, किन्तु पृथ्वी अपने ऊपर चलने वाले प्रत्येक प्राणी के चरणचिह्न पहचानती है।
यह धूल केवल धूल नहीं है। इसमें असंख्य यज्ञों की राख है। ऋषियों के तप की ऊष्मा है। वीरों का रक्त है। माताओं के आँसू हैं। किसानों का पसीना है। यही पृथ्वी सबको धारण करती है और किसी से शिकायत नहीं करती।
मैं उसी पृथ्वी की पुत्री हूँ।
भूमि से उत्पन्न हुई हूँ।
जिसने मुझे जन्म दिया है, उसका स्वभाव मेरे भीतर कैसे न होगा?”
राम मौन होकर सुन रहे थे।
लक्ष्मण की दृष्टि आदर से झुक गई।
सुमन्त्र ने अनुभव किया कि आज वह जनकनन्दिनी से नहीं, स्वयं वेद की वाणी से संवाद कर रहे हैं।
सीता आगे बोलीं—
“तात!
मनुष्य अपने कुल से पहचाना जाता है।
कोई सूर्यवंशी है, कोई चन्द्रवंशी।
किन्तु मेरा वंश पृथ्वी है।
पृथ्वी का धर्म क्या है?
सहन करना।
उत्पन्न करना।
पालन करना।
और आवश्यकता पड़ने पर सब कुछ अपने भीतर समेट लेना।
मैं उसी धर्म की संतान हूँ।”
उन्होंने सामने फैले हुए वन की ओर संकेत किया।
“देखिए।
यहाँ कितने वृक्ष हैं।
क्या कभी किसी वृक्ष ने अपनी छाया का मूल्य माँगा?
क्या कभी किसी नदी ने जल पिलाने से पूर्व जाति पूछी?
क्या कभी किसी पर्वत ने यह कहा कि मैं केवल श्रेष्ठ लोगों को ही आश्रय दूँगा?
प्रकृति का प्रत्येक अंग निष्काम है।
इसीलिए वह ईश्वर के सबसे निकट है।”
अचानक उनकी दृष्टि एक हिरणी पर पड़ी।
हिरणी अपने दो शावकों सहित जल पी रही थी।
सीता मुस्कुराईं।
“तात!
देखिए उसे।”
सुमन्त्र ने देखा।
“आपको केवल एक हिरणी दिखाई दे रही होगी।
किन्तु मुझे उससे अधिक दिखाई दे रहा है।
उसकी दृष्टि बार-बार पश्चिम दिशा में जा रही है।
उसके कान स्थिर नहीं हैं।
उसकी पूँछ बार-बार काँप रही है।
उसने जल पीना भी पूरा नहीं किया।”
कुछ क्षण बाद हिरणी अपने दोनों बच्चों को लेकर तीव्र गति से वन के भीतर चली गई।
सुमन्त्र आश्चर्यचकित थे।
सीता बोलीं—
“अब कुछ ही देर में यहाँ कोई हिंस्र पशु आएगा।”
राम ने लक्ष्मण की ओर देखा।
लक्ष्मण ने धनुष उठा लिया।
अधिक समय नहीं बीता था कि झाड़ियों से एक विशाल व्याघ्र निकल आया।
वह उसी जलाशय की ओर बढ़ा जहाँ अभी हिरणी थी।
सुमन्त्र विस्मय से भर उठे।
“माते! आपको यह कैसे ज्ञात हुआ?”
सीता ने सहज भाव से उत्तर दिया—
“जो पृथ्वी को पढ़ना सीख लेता है, उसके लिए प्रकृति स्वयं ग्रन्थ बन जाती है।
वन बोलता है।
पत्तियाँ बोलती हैं।
पशु बोलते हैं।
नदियाँ बोलती हैं।
केवल मनुष्य सुनना भूल गया है।”
कुछ दूर चलते ही उन्होंने आकाश की ओर देखा।
मेघ नहीं थे।
फिर भी उन्होंने कहा—
“आज सायंकाल वर्षा होगी।”
लक्ष्मण ने ऊपर देखा।
आकाश स्वच्छ था।
उन्होंने विनम्रता से पूछा—
“भाभी! बादल तो कहीं दिखाई नहीं देते।”
सीता मुस्कुराईं।
“बादल आकाश में बनने से पहले जल में जन्म लेते हैं।”
वह नदी के किनारे गईं।
जल में छोटी-छोटी मछलियाँ बार-बार ऊपर आ रही थीं।
कुछ जलपक्षी सामान्य से अधिक नीचे उड़ रहे थे।
दूर खड़े सारस बार-बार अपने पंख समेट रहे थे।
सीता बोलीं—
“जल का ताप बदल रहा है।
वायु की दिशा बदल चुकी है।
नमी बढ़ रही है।
पक्षियों को आकाश का भार पहले ही ज्ञात हो जाता है।
मछलियाँ जल के भीतर होने वाले परिवर्तन पहले ही अनुभव कर लेती हैं।
मनुष्य बादल देखकर वर्षा का अनुमान लगाता है।
प्रकृति वर्षा आने से बहुत पहले संकेत दे देती है।”
सायंकाल घनघोर वर्षा हुई।
सुमन्त्र अब केवल सुन नहीं रहे थे।
वह सीख रहे थे।
उन्होंने पूछा—
“देवि!
क्या यही कारण है कि महाराज जनक आपको भूमिजा कहते थे?”
सीता ने गम्भीर स्वर में कहा—
“नहीं तात।
भूमिजा होना केवल पृथ्वी से उत्पन्न होना नहीं है।
भूमिजा वह है जो पृथ्वी के दुःख को अपना दुःख समझे।
जिसे वृक्ष कटने पर पीड़ा हो।
जिसे नदी सूखने पर अपनी शिराएँ सूखती प्रतीत हों।
जिसे घायल पशु देखकर अपने हृदय में वेदना हो।
जिसे खेत की मिट्टी की सुगंध से माँ का स्पर्श अनुभव हो।
भूमि केवल जन्म नहीं देती।
वह अपने बच्चों की परीक्षा भी लेती है।”
इतने में लक्ष्मण ने देखा कि दूर वृक्षों पर बैठे बंदर असामान्य स्वर में चिल्ला रहे थे।
सीता ने तुरंत कहा—
“आर्य लक्ष्मण!
दक्षिण दिशा से सावधान रहिए।”
“क्यों?”
“वन के वानर बिना कारण इतना तीव्र स्वर नहीं करते।
कहीं कोई बड़ा जीव आ रहा है।”
कुछ देर बाद एक विशाल गजराज उसी दिशा से निकला।
उसके पीछे पूरा झुंड था।
राम ने मुस्कुराकर कहा—
“जनकनन्दिनी!
तुम्हारी दृष्टि वास्तव में अद्भुत है।”
सीता ने विनम्रता से उत्तर दिया—
“प्रभु!
मैं कुछ नहीं जानती।
प्रकृति स्वयं सिखाती है।
जिसका मन शांत हो जाए, वही उसकी भाषा समझ सकता है।”
राम ने पहली बार सुमन्त्र की ओर देखकर कहा—
“तात!
राज्य केवल शस्त्रों से सुरक्षित नहीं होता।
राज्य उन लोगों से सुरक्षित होता है जो पृथ्वी को समझते हैं।
जिस राजा को वृक्षों का ज्ञान नहीं,
जिसे नदियों का स्वभाव नहीं पता,
जिसे पशुओं की पीड़ा नहीं सुनाई देती,
वह प्रजा की रक्षा भी नहीं कर सकता।”
सीता ने आगे कहा—
“धर्म केवल यज्ञ नहीं है।
धर्म केवल पूजा नहीं है।
धर्म वह है जिससे जीवन सुरक्षित रहे।
जो वृक्ष बचाए वही धर्म है।
जो नदी बचाए वही धर्म है।
जो पृथ्वी को संतुलित रखे वही धर्म है।
यदि मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध खड़ा हो जाए,
तो उसका कोई भी धर्म उसे नहीं बचा सकता।”
सुमन्त्र के नेत्र भर आए। उन्होंने अनुभव किया कि अयोध्या का राजमहल एक महारानी खो रहा है, किन्तु वन एक महर्षि प्राप्त कर रहा है। उन्हें लगा कि भविष्य में लोग राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहेंगे, किन्तु यदि वे सीता को केवल राम की पत्नी कहकर सीमित कर देंगे तो इतिहास स्वयं अधूरा रह जाएगा। क्योंकि उनके सामने बैठी स्त्री केवल सहधर्मिणी नहीं थी— वह पृथ्वी का धैर्य थी। वह वन का विज्ञान थी। वह धर्म का हृदय थी। वह करुणा की शक्ति थी और वह उस सनातन सत्य की जीवित प्रतिमा थी जिसके बिना स्वयं रामकथा भी पूर्ण नहीं हो सकती।