गुरद्वारे में नमाज पढ़वाने वालों’ के पास दादी के इस प्रश्न का जवाब है क्या?

वर्षों बाद “द कश्मीर फाइल्स” सिनेमा हॉल में देखी थी।

चूंकि मैं ‘सेक्युलरिज्म’ की चाशनी लगाकर अब तक परोसे जा रहे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के काले सच से पूरी तरह वाकिफ़ हूँ, इसलिए मुझे फ़िल्म में दिखाए गए दृश्य देखकर कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ। हाँ व्यथित जरूर हुआ, पीड़ा जरूर हुई। क्रोध भी खूब आया।

फ़िल्म देखकर मुझे तत्कालीन राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था पर तरस भी आता रहा। कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार होते देखकर और अपने ही देश मे तथाकथित बहुसंख्यकों को 35 वर्षों से विस्थापित की जिंदगी जीता देखकर दुःख होता है और इस नरसंहार के विरुद्ध कश्मीरी हिंदुओ को किसी भी तरह का प्रतिकार न करते हुए देखकर शर्म भी आती है। सभी उच्च पदों पर उस समय कश्मीरी हिंदू ही थे। उनके पास पैसा था, पावर थी। वे चाहते तो प्रतिकार कर सकते थे। पर ऐसा हो न सका।

वामपंथियों के लिए यह फिल्म ‘प्रोपेगेंडा’, सिकुलरों के लिए ‘एकतरफा सच’ और आम लोगों के लिए महज एक ‘साहसिक’ फिल्म होगी। लेकिन जिन लोगों ने जेहादी कुकुरमुत्तों के कुकृत्यों को भुगता है, अपने परिवार या रिश्तेदारों से उनके पाशविक कृत्यों के बारे में सुना है, उनके लिए यह फ़िल्म उस विभीषिका और उस भीषण नरसंहार को पुनः जीने जैसा है।

सिनेमा हॉल में हमारे बाएं तरफ बैठी हुई ‘दादी’ को बंटवारे के समय जब लाहौर से जान बचाकर भागना पड़ा, तब वह महज 11 साल की थी। उनके परिवार और रिश्तेदारों को लूटने, मारने, काटने वाले उनके पड़ोसी ही थे। बस उनका मजहब अलग था, वह लोग ‘ईमान वाले’ थे। शांतिप्रिय समुदाय के थे और दादी और इनके रिश्तेदार उनके लिए केवल ‘काफ़िर’ थी। बस इसी अपराध की सजा इनके परिवार वालों और रिश्तेदारों को जान-माल-इज्जत गंवाकर भुगतनी पड़ी। कुछ लोगों ने तो भागने या मरने से परिवार की महिलाओं और बच्चियों को अपने हाथों से इसलिए मार डाला ताकि वे म्लेच्छों के हाथ न लगें।

“द कश्मीर फाइल्स” फिल्म देखकर दादी जी अत्यंत भावुक हो गई थी। हाउस फुल होने के बावजूद पूरी फ़िल्म के दौरान सन्नाटा पसरा रहा। इंटरवल में जब लाइट जली, मेरी तंद्रा टूटी, ध्यान पर्दे की तरफ से हटा तो देखा कि उनकी आँखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। मैंने सांत्वना देने की कोशिश की तो वह आर्द्र स्वर में कहने लगी- “बेटा यह केवल फिल्म नहीं है, बल्कि हम जैसे लाखों लोगों की आपबीती है। आज तक हमें समझ नहीं आया कि हमारा अपराध क्या था और हमारी उस पीड़ा को दिखाने और देश को बताने में इतने वर्ष क्यों लग गए?”

‘गुरद्वारे में नमाज पढ़वाने वालों’ के पास दादी के इस प्रश्न का जवाब है क्या?

—विनय सिंह