सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

भादों वाला भद्दर प्यार

(एक काल्पनिक कहानी)

बचपन की बात है। एक बार ऐसे ही झमाझम बारिश हो रही थी और मुझे जोर से ‘दो नंबर’ लग आई। तब घरों में शौचालय नहीं हुआ करते थे इसलिए मैं छाता लेकर घर के पास वाले तालाब की तरफ जाने लगा। लेकिन वहां पहुंचने से कुछ पहले देखता हूं कि तालाब के पास वाले नीम के पेड़ की डाली पर एक आकृति सामने वाले घर की तरफ मुंह करके बैठी हुई है ।

मुझे लगा शायद अम्मा और दादी से जो भूतों की कहानियां सुनते आया हूं, वह आज सच हो गई। कोई भूत-प्रेत बैठा होगा। शायद उसके पांव भी उल्टे होंगे और वह पास जाते ही मुझसे तंबाकू या बीड़ी मांगेगा। फिर वह भूत मुझे लग जायेगा, मुझे अपने वश में कर लेगा।

यह कल्पना करते ही मैं सिहर उठा और उल्टे पांव घर की तरफ दौड़ लगा दी। डर के मारे दो नंबर, एक नंबर सब कुछ भूल गया।

मुझे दौड़ते हुए वापस आते देख छोटे बाबा ने हैरत से पूछा कि-” का होइगा? कौनो कुकुर दौड़ा लिहिस का?? “

मैंने लगभग कांपते हुए कहा-” नहीं बाबा , तालाब के पास वाले पेड़ पर कोई भूत बैठा हुआ है। “

बाबा बोले -” अरे बंदार-वंदार होई।और को एत्ती बरसात मां पेड़ पै जान देई।”

मैंने पूरे विश्वास से कहा- ” नहीं बाबा। बंदर नहीं है। मैंने पास से देखा है।कोई आदमी जैसा भूत है। “

बाबा बोले- “चलो हमहू देखी को एत्ती बरसात मां सती हून जा रहा है। “
बाबा ने लाठी उठाई और मेरे साथ तालाब की ओर चल पड़े। नीम के पास पहुंचने से पहले ही मैंने इशारा किया कि वह देखो कोई बैठा हुआ है। पूरब की तरफ वाले घर की ओर मुंह करके।

बाबा ने देखा तो सचमुच में कोई नीम के पेड़ पर बैठा हुआ था। वह और पास गए और बोले-
“अरे ई तो दीपू अहीं। लेकिन ई बैताल काहे बने हैं?? खैर, तुम जाव निपटि के आव, तब तक हम इनके हालचाल लेइत है।”

मैं निपट के आया तो बाबा से पूछा :- ” यह भैया पेड़ पर क्यों बैठे हुए हैं? घर से नाराज हैं क्या?? “
हालांकि बाबा को सच पता चल चुका था लेकिन शायद वह मुझे बताना नहीं चाहते थे। इसलिए बात को टाल गए। बोले:-” जल्दी घरै जाव नहीं तो भीजि जइहो। सर्दी-जोखाम होइ जाई। हाथ जरुर राख से धोइ लेह्यो।”

कहते हैं कि इश्क और मुश्क कभी छुपाए नहीं छुपता । कुछ दिन बाद किसी खबरी ने मुझे सूचना दी कि दीपू भैया आजकल गोविंदा बने घूम रहे हैं। उन्हें तालाब के सामने वाले घर में रहने वाली दिव्या भारती से बहुत जोर से प्यार हो गया है। उसी को इंप्रेस करने के लिए भरी बरसात में पेड़ पर बैठे हुए थे। एक बार जेठ की भरी दुपहरी में ऊसर में खड़े होकर भी प्रेम परीक्षा दे रहे थे। आजकल वह एक ही गाना गुनगुनाते रहते हैं-:-
“मैं पागल, प्रेमी दीवाना—–
दिल तेरी मोहब्बत का मारा।
तू रूठी तो रूठ के इतनी दूर चला जाऊंगा।
सारी उमर पुकारे फिर भी लौट के न आऊंगा।
लौट के न आऊंगा—– ओ ओ “

उस समय मुझे लगता था कि सच्चा प्रेम करने वाले एक न एक दिन मिलते जरूर होंगे। घर, गांव, समाज के लोग कितना भी उपहास उड़ाएं, विरोध करें लेकिन दो जिस्मों को एक जान होने से रोक नहीं पाते होंगे। सारी कायनात उन्हें मिलाने में लग जाती होगी। सच्चा प्यार कभी असफल नहीं होता होगा।

लेकिन अफसोस कि मेरी सारी कल्पनाएं और जज्बात फिल्मी निकले। उनकी प्रेम कहानी का अंत शोला और शबनम की तरह बिल्कुल भी नहीं हुआ। क्योंकि गोविंदा के प्यार की भनक होते-होते दिव्या भारती के घर वालों को लग चुकी थी और अगली बरसात से पहले उन्होंने दिव्या भारती के हाथ पीले कर दिए।

(विनय सिंह बैस, बैसवारा वाले)