उष्ण प्रेम (लघु कहानी)

नीना अन्दोत्रा पठानिया, पठानकोट ,पंजाब –


सारे बयान सरिता के खिलाफ जा रहे थे , हर बयान के बाद एक-एक उम्मीद दम तोड़ रही थी । हर आँख उस से कई सवाल कर रही थी , उन जख्मों को कब तक छुपाती जो उसकी रूह पर लगे थे और उसकी रूह को छल्ली करने की वालें हर बार की तरह इस बार भी बेकसूर साबित हो रहे थे ।
हर मुश्किल का सामना सरिता ने आज के दिन के लिए किया था पर फिर भी आज उसको अपना आप हारता हुआ नजर आ रहा था ।
मिसेज माथुर सरिता की दर्द भरी चीखे सुन रही थी ,वो चीखे जो उसको अंदर तक हिला रही थी । अचानक देखा तो सरिता की आखें मिसेज माथुर पर अटकी हुई थी ,मिसेज माथुर नजरअंदाज कर रही थी पर वो आँखे उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी , मानों उसको पूछ रही हो ,क्या तेरे औरत होने में और मेरे औरत होने में कोई अन्तर है ? फिर क्यों तुझे इस आग की लपटे दिखाई नही दे रही जिसमे मैं जल रही हूँ ? सिर्फ इसलिए कि मैं तेरे खून से नहीं सिंची गई हूँ और वो हैवान तेरे खून से सींचा हुआ पुरुष है ।
सब कुछ सरिता के विरुद्ध जा रहा था और मिसेज माथुर सब देख कर कभी सरिता के जख्मों को खुद पर महसूस करती तो कभी एक माँ होने के नाते बेटे के उज्जवल भविष्य की कामना करती,जैसे उसके अंदर एक औरत और एक माँ का संघर्ष चल पड़ा हो ।
“मुझे कुछ कहना है जज साहब …..”
“पर आपकी तो स्टेटमेंट हो चुकी है मिसेज माथुर”
“पर मुझे कुछ कहना है ,सबको बताना है “
“यह शख्स उस रात मेरे साथ नही था ,मैंने सारी रात इसका इंतजार किया था पर यह सुबह ५ बजे घर आया था और जो भी सामान वारदात के स्थान से मिला है वो सब इसका है ।”
“मिसेज माथुर जे आप क्या बोल रही है ? यह आपका बेटा है “ सर पकड़ते हुए वकील बोला ।
नहीं……. एक बलात्कारी कभी किसी का बेटा ,भाई ,पति नही हो सकता ,बलात्कारी सिर्फ एक बलात्कारी होता है ,मैं एक माँ,बहन ,पत्नी होने से पहले एक औरत हूँ और समझ सकती हूँ जब एक औरत की इज्ज़त को कोई चिल, गिद्धों की भांति नोंच-नोंच कर खाता है तो औरत का जिस्म ही लहू-लुहान नहीं होता उसकी रूह भी चीथड़े-चीथड़े हो जाती है ।
मिसेज माथुर सरिता की ओर देख कर बोलती जा रही थी, आंसू झर-झर बह रहे थे ,सरिता उन आंसुओं में अपने लिए प्रेम की गर्माहट ,एक इंसानियत देख रही थी वो प्रेम जो उसको तेज़ तूफान से बचाने के लिए आज उमड़ पड़ा था ।