देश के घृणित राजनेता ‘देश’ को ‘गिरवी’ रखना चाहते हैं

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


(यह टिप्पणी अपेक्षाकृत ईमानदार नेताओं के लिए नहीं है।)


धर्म और जाति के नाम पर घृणित राजनेता जिस तरह की राजनीति करते आ रहे हैं, उससे ‘भारतराष्ट्र’ कितना पिछड़ता जा रहा है, इस पर उन सबने कभी विचार किया है? माना कि उनमें से कोई असाक्षर है; कोई पाँचवीं फेल, कोई दसवीं फेल, कोई आपराधिक, कोई तस्कर, कोई भू-माफ़िया, कोई बहुरुपिया, कोई कबूतरबाज़, कोई बलात्कारी-व्यभिचारी तो कोई निहायत निकम्मा, निर्लज्ज, निकृष्ट है।

आज देश की आन्तरिक स्थिति नितान्त विस्फोटक हो चुकी है, जिसके लिए धार्मिक और जातीय राजनीति पूरी तरह से उत्तरदायी हैं। मात्र सत्ता की राजनीति के लिए ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर राजनीति करनेवाले लोग भारतराष्ट्र की गरिमा को देश ही नहीं, विदेशों में भी धूमिल करते आ रहे हैं।

आज़ादी के बाद से जिस तरह की राजनीतिक प्रवृत्तियाँ उभर कर आयी हैं और वर्तमान समय में जिस रूप में दिख रही हैं, वे भारतीयता को नष्ट करने के लिए आतुर हैं। आज देश का एक-एक नागरिक ‘विश्व बैंक’ और ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ आदिक का क़र्ज़दार है; देश के राजस्व में यही राजनीतिक लोग सेंध लगाते आ रहे हैं। ‘रोड-शो’, ‘शाइनिंग इण्डिया’ का सर्कसी खेल, विवेकाधीन कोष और विधायक-सांसद-निधि के दुरुपयोग आदिक भाँति-भाँति की कलाबाज़ियाँ दिखाते हुए किये-कराये जाते रहे हैं।

वैसे तो देश की संसद् चलने नहीं दी जाती, जिसके लिए सत्तापक्ष भी प्रकारान्तर से सहयोग करता है, परन्तु जब सांसदों के भत्ते आदिक बढ़ाने का विधेयक संसद्-पटल पर रखा जाता है तब उसे सर्वसम्मति से पारित करा दिया जाता है, अर्थात् “चोर-चोर मौसेरे भाई।” यह देश की संसद् के दोनों सदनों में तथाकथित लोकतन्त्र का प्रतिनिधित्व करनेवाले एक-एक संसद् की ‘दोगलेबाज़ी’ सिद्ध करती है, अर्थात् “हाथी के दाँत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ।”

समूचे देश में ‘विपक्षविहीन’ साम्राज्य-स्थापना’ की असंवैधानिक चिन्तन और अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा किसी लोकतन्त्रीय देश के लिए कितनी घातक सिद्ध हो सकती हैं, इसका अनुभव तथाकथित विस्तारवादी चेहरे नहीं कर सकते, क्योंकि उनका सारा समय, संवेदना, योग्यता ‘सत्ता’ को बनाये रखने और अतिरिक्त घृणित और बीभत्स अलोकतान्त्रिक कुचक्र रचने में नष्ट हो जाती हैं।
सर्वाधिक चरित्रहीन वह व्यक्ति होता है, जो अपने कथन-कर्म में लगातार अन्तर बनाये रहता है और मुखौटा लगाकर निर्लज्ज की तरह से एक-के-बाद-एक सब्ज़बाग़ दिखाता रहता है।

बेहद बेहया व्यक्ति वह होता है, जो सत्ता में स्वयं को बनाये रखने के लिए किसी भी हथकण्डे का इस्तेमाल करता है। सर्वाधिक कृतघ्न वह होता है, जो सहारा देनेवाले के साथ विश्वासघात करता है। ऐसा चरित्रवाला ‘किसी’ का भी सगा नहीं होता। जनता को चाहिए कि ऐसे व्यक्ति पर पद-प्रहार कर, उसे सत्ता से बेदख़ल कर दे।