तलवार की धार पर!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


इतिहास और पुराण साक्षी हैं कि हिन्दुओं ने ही ‘हिन्दुओं’ की जड़ें खोदी हैं और आज भी खोद रहे हैं।
और ये जो आपने प्रश्न किये हैं, उनका उत्तर व्यक्तिविशेष से नहीं, अपितु सम्पूर्ण कथित हिन्दू-सम्प्रदाय से माँगिए, जिसमें आपकी भी ‘शिथिल’ भूमिका है। उन मठाधीशों से माँगिए, जो स्वार्थ-सिद्धि के लिए हिन्दुत्व का चोला ओढ़े हुए हैं और जब उनके हिन्दुत्व पर कुठाराघात किया जाता है तब दुम हिलाते भागते हैं। हमारी मूल भाषा संस्कृत मृतप्राय घोषित कर दी जाती है और प्रतिमाह लाखों रुपये अर्जित करनेवाले विश्वविद्यालयस्तरीय हिन्दू प्राध्यापकों को पक्षाघात हो जाता है; हिन्दूवादी संघटन, राजनीतिक दलें तथा सन्त-महन्थ नि:शब्द हो जाते हैं, अन्तत:, क्यों? जिन हिन्दुओं की जम्मू-कश्मीर राज्य में आयेदिन हत्याएँ की जा रही हैं, वहीं के राजनीतिक दल के साथ गठबन्धन कर हिन्दूवादी पार्टी ‘भारतीय जनता पार्टी’ उसके संकेत पर ‘ता-ता थै-थै’ कर रही है और स्वार्थान्ध निरीह लोग ‘नमो-नमो’ का उच्चारण कर रहे हैं!
इस प्रकार का कोई भी दायित्व व्यष्टिमूलक नहीं होता है, प्रत्युत समष्टिगत होता है।
‘आर्यावर्त्त’ से हम ‘न्यू इण्डिया’ में आ गये हैं। कैसे आ गये? कौन ले आया? वही ले आया, जो स्वयं को हिन्दुओं का पुरोधा कहता है। आज इस परिवर्त्तन के विरुद्ध आपका हिन्दू-सम्प्रदाय मौन क्यों बना हुआ है?
आप बुद्धिजीवी-वर्ग के अन्तर्गत आते हैं, आज तक उसके दुष्कृत्यों के विरोध में आपका एक शब्द भी सार्वजनिक हुआ है? नकारात्मक प्रवृत्तियों के समक्ष वैचारिक आत्मसमर्पण और लघुता-प्रदर्शन प्रथम श्रेणी की ‘बौद्धिक’ कायरता मानी गयी है। मौन को तोड़िए और मुखर बनिए। मेरे पास आज ‘संघटन की शक्ति’ होती तो ‘राष्ट्रवाद’ के साथ विश्वासघात करनेवाले संघटनों की चूलें हिला देता।
आज मात्र कहने-सुनने के लिए ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ शब्द रह गये हैं। आये-दिन भारत को ‘न्यू इण्डिया’ बनाने की बात एक हिन्दूवादी प्रधान मन्त्री (नरेन्द्र मोदी) करता है। इसका विरोध कितने हिन्दूवादी संघटन और ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ को सीने से चिपकाकर घूमनेवाले लोग करते हैं? विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली हिन्दूवादी संघटन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’के सरसंघ चालक मौन क्यों हैं? कहाँ हैं ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ विषयक प्रवचन करनेवाली ‘विश्व हिन्दू परिषद्’ के अधिकारिगण?
उक्त सन्दर्भ में एकमात्र सत्य यह है कि ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ को मात्र सत्ता की राजनीति करने के लिए एक ‘रक्षाकवच’ के रूप में बीभत्स ढंग से प्रयोग किया जा रहा है, क्योंकि यहाँ हिन्दुत्व को मात्र एक प्रयोगशाला तक सीमित करके, उसमें बैठकर स्वार्थपूर्ण साम्प्रदायिक-जातीय अन्तर्कलह की आराधना की जा रही है।
हिन्दुओं की आस्था राममन्दिर बनवाने के नाम पर राम के साथ ही दशकों से ठगी कौन करता आ रहा है? व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडियापालिका को अपने संकेत पर नचानेवाला जो हिन्दूवादी व्यक्ति आज देश के व्यावहारिक शीर्ष पद पर अतिरिक्त बहुमत के साथ विराजमान है, वह अपने हिन्दुओं की आस्था ‘राम’ को आश्रय देने के लिए सौदेबाज़ी कर-करा रहा है, उसकी हिन्दुओं के प्रति यह किस प्रकार की निष्ठा कही जायेगी?
यहाँ कितना टंकित करूँ; आमने-सामने हम दोनों होते तो संवाद करने का कुछ और ही सुख होता।
मेरी लेखनी स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, अपने गन्तव्य की ओर बढ़ती जा रही है; उसने आज तक किसी के भी साथ समझौता नहीं किया है; माना कि वह अभावों में रही है, परन्तु किसी भी प्रभुतासम्पन्न कुपात्र के समक्ष नतमस्तक नहीं हुई है; वही उसकी प्रभुता है और उसका वैशिष्ट्य भी।