और इस तरह कर्नाटक का पर्दा गिरा!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

माना कि कर्नाटक में काँग्रेस ने जोड़-तोड़ कर अपनी सरकार बना ‘ही’ ली है; परन्तु सम्पूर्ण देश के राजनीतिक मानचित्र पर उसकी स्थिति अभी अतीव शोचनीय है; संघटन के स्तर पर वह बहुत शिथिल है; सबसे बड़ी बात, काँग्रेस की कोई स्पष्ट नीति अभी तक उभर कर नहीं आयी है। इतना अवश्य है कि मदान्ध नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को एक आघात अवश्य पहुँचा है, जो कि पहुँचाना अनिवार्य हो गया था, क्योंकि राजनीति के वे दोनों पहलवान और घोर दन्दी-फन्दी पिछले साढ़े चार वर्षों से जिस आक्रामकता के साथ लोकतन्त्र की छाती पर चढ़कर दुर्द्धर्ष रूप में ‘दुर्नय’ और ‘दुर्नीति’ आचरण का परिचय देते हुए, भारतीय राजनीति को अपनी कनिष्ठिका पर नचाते आ रहे थे, उससे लोकतन्त्र के कलेजे को ठण्ढक अवश्य पहुँची है; साथ ही स्वतन्त्र वातावरण में श्वास लेने का अवसर भी मिला है।

अहम्मन्यता सदैव त्याज्य और अस्वीकार्य रही है; परन्तु इतिहास-पुराण साक्षी हैं कि किसी भी मदान्ध व्यक्ति को जब लगातार सफलता मिलती आती है तब उसका दम्भ और पाखण्ड ‘और’ विस्तार करता जाता है।

कर्नाटक की विधानसभा-चुनाव में किसी भी दल का कोई लोकतन्त्रीय उद्देश्य नहीं था। यदि होता तो वह बताता कि किस आधार पर उसका दल चुनाव-क्षेत्र उतरा है। सभी विरोधी दल एक-दूसरे को प्रत्येक स्तर पर नीचा दिखाने का प्रयास करते आ रहे थे। प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह तो अपने भाषणों में मर्यादा की सारी सीमाएँ पार कर गये थे। उनके एक-एक शब्द पर यदि ग़ौर किया जाये तो प्रतीत होता है, मानो कोई चिर शत्रु ज़ह्र उगल रहा हो। वहीं काँग्रेस और जे०डी०एस० एक-दूसरे पर एक अलग प्रकार की रणनीति के अन्तर्गत आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे थे और मौक़ा हाथ लगते ही गले मिल गये। इसे कहते हैं, ‘विद्रूपतापूर्ण राजनीति’, जहाँ अवसर अर्जित करने के लिए ‘गधे’ को भी ‘बाप’ बना लिया जाता है।

काँग्रेसियों को यह भूलना नहीं चाहिए कि ‘दिल्ली’ अभी बहुत दूर है। मायावती ने कर्नाटक-चुनाव के सन्दर्भ में मीडियाकर्मियों को सम्बोधित करते हुए कल (१९ मई, २०१८ ई०) प्रसन्नता व्यक्त की थी; परन्तु राहुल गांधी का ‘नाम’ तक नहीं लिया था; क्योंकि मायावती को ‘केन्द्र’ की गद्दी दिख रही है, जिसका समर्थन अखिलेश सिंह यादव ने एक वर्ष पूर्व ही कर दिया था। अखिलेश ने कल ही कहा कि मध्यप्रदेश-चुनाव के लिए स०पा०-काँग्रेस का कोई गठबन्धन नहीं है। इतना ही नहीं, देश का वह राज्य, जिसकी सर्वाधिक भूमिका किसी भी दल के नेता को प्रधानमन्त्री बनाने की होती है, ‘उत्तरप्रदेश’ है और उस राज्य में वर्तमान में लोकप्रियता की दृष्टि से काँग्रेस चौथे स्थान पर है। वहाँ काँग्रेस को अपनी प्रभावकारी उपस्थिति अंकित कराने के लिए राहुल गांधी को ‘एड़ी-चोटी का ज़ोर’ लगाना होगा। लगातार पाँच वर्षों तक परिश्रम करने के बाद काँग्रेस के लिए सत्तासीन करानेवाला सफलता का द्वार खुलना आरम्भ हो जायेगा।

भारतीय जनता पार्टी के स्वयंभू अधिनायक नरेन्द्र मोदी के चमत्कार की चमक धीरे-धीरे कुन्द पड़ती जा रही है और उनकी पदीय और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हुई है, जिसके लिए वे ‘स्वयं’ उत्तरदायी हैं, अन्यथा मोदी को एक अपरिपक्व राजनेता राहुल गांधी यह नहीं कहते, “मोदी एक भ्रष्टाचार (भ्रष्ट) हैं।” मोदी की आज यदि सन्तान होती तो वह राहुल की अवस्था के लगभग ही होती। अब मोदी को भी सँभल-सँभल कर शब्दप्रयोग करना होगा, अन्यथा वे भी और अभद्र शब्दों-द्वारा अपमानित होंगे, जिससे देश के प्रधानमन्त्री-पद की गरिमा और महिमा का मानमर्दन होता दिखेगा, जो हमारे ‘राष्ट्र’ का अपमान होगा।
भला हो, उच्चतम न्यायालय के उन तीन न्यायाधीशगण :– अशोकभूषण, अर्जन सीकरी तथा अरविन्द बोवडे का, जिन्होंने उदात्त न्यायिक परम्परा का निर्वहन करते हुए अलोकतान्त्रिक कृत्यों की निन्दा करते हुए, लोकतन्त्र की प्रतिष्ठा की है। आरम्भ में, न्यायाधीश-त्रय ने काँग्रेसी अभिभाषक अभिषेक मनु सिंघवी के तर्कों को सुविचारित ढंग से काटते हुए, स्पष्टत: बता-जता दिया था कि वे राज्यपाल के विशेषाधिकार को चुनौती नहीं दे सकते। इस तरह काँग्रेस को वहाँ पराजित होना पड़ा था; परन्तु भारतीय जनता पार्टी के अभिभाषक और पूर्व-एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को जिस तरह से न्याधीशद्वय– सीकरी और बोवड़े ने आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया था, उससे सुस्पष्ट हो चुका था कि ‘स्पष्ट बहुमत’ न रहने के बाद भी १५ दिनों का समय देने का कोई औचित्य नहीं है। वह १५ दिनों में कैसे बहुमत प्राप्त करेगी? और हुआ भी वही। जब आपके पास बहुमत है ही नहीं तो कैसे सिद्ध करने का दावा करते हैं— इस प्रश्न पर भा०ज०पा० का अभिभाषक सकपका कर रह गया; कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सका था।

ऐसे में, विशेष खण्डपीठ के न्यायाधीशगण को प्रकरण समझते देर नहीं लगी कि मात्र १०४ सदस्योंवाले दल के पास बहुमत के लिए आवश्यक ७ सदस्य कहाँ से और कैसे आयेंगे। २४ घण्टे के भीतर ही कर्नाटक के मुख्य मन्त्री बी० एस० येदियुरप्पा को विश्वास-मत अर्जित करना होगा– यह निर्णय लगभग अपना प्रतिदावा प्रस्तुत करनेवाले राजनीतिक दल काँग्रेस और जे०डी०एस० के लिए ‘संजीवनी’ का काम कर गया था। इतना ही नहीं, निर्णय कर्नाटक के राज्यपाल यजुभाईवाला के निर्णय को भी कठघरे में खड़ा कर चुका था।

मुख्यमन्त्री की पराजय तो हो ही चुकी है; अब लगभग एक सप्ताह-बाद उसी विशेष खण्डपीठ के न्यायाधीशगण ‘राज्यपाल के राजनीतिक दलों को सरकार गठित करने के विवेकाधिकार’ की न्यायिक समीक्षा करेंगे, जो समय-सत्य है। एक गुटनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक विधायन की अति आवश्यकता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २० मई, २०१८ ई०)