अब तक लगभग सवा दो लाख लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है, जिसकी सीधी जिम्मेदारी सरकार की है। इसमें तमाम अपनों को भी खोया, आप चुप हैं, सरकार से कोई सवाल नहीं, मरनेवालों से कोई संवेदना भी नहीं?
लेकिन दो लोग भी जातीय/धार्मिक झगड़े(अधिकांश प्रायोजित) में मर जायें तो आपकी संवेदना जाग जाती है, क्योंकि यह आपकी संवेदना नहीं जातीय/सांप्रदायिक दुर्भावना है, मूलतः आप हत्यारे हैं जिसे खून चाहिए होता है? लाशें चाहिए होती हैं? देश से, मानवता से घंटा कोई लेना देना नहीं, अन्यथा कोरोनाकाल में सरकारी कुप्रबंधन से उपजे नरसंहार पर भी बोलते?
सुधान्शु बाजपेयी (प्रवक्ता, उप्र कॉङ्ग्रेस)