चाह, साहस और अनुभव

आकांक्षा मिश्रा-


यह हर्ष का मौसम है सुनकर तुम्हें अजीब लगेगा मौसम तो आते हैं और जाते हैं लेकिन हम रहते है मौसम में ही एक लंबे अंतराल के बाद तुम्हें देखती हूं तो लगता है कि कुछ बातें अभी शेष है जिसका परिमार्जन है जो भी है कहना सुनना है ।

तुम्हें पता है या अवगत करा देती हूं मेरी सारी व्यवस्थाएं तो तुम से शुरू हुई थी और सारी धीरे-धीरे विवशता ओं में बदलती चली गई यह जो दौर है अकारण ही बदलने का दौर है न तुम यहां हो न उस जगह पर कोई और है गौर करने की बात है प्रेम श्रद्धा में परिणित होने लगी जो कभी श्रद्धा प्रेम में थी यह भी एक व्यवस्था के दरमियां है।

तुम्हारे जाने के बाद कुछ भी खोया नहीं एक साम्राज्य होना जरूरी होता है और साम्राज्य का सम्राट होना भी उतना ही जरूरी होता है पहली भूमिका तुम्हारी रही तुम हारे हुए साथी की तरह रहे फिर भी अपनी जीत का जश्न खूब मनाया गौर करने की बात है हैरान भी है लेकिन दोनों का तुम्हारे जीवन में कहीं तालमेल नहीं दिखा अब लगा कि तुम्हारा जाना है आने की अपेक्षा ज्यादा उचित है।

देखो यह अक्टूबर और नवंबर दोनों ही बीत गए तुम्हें याद किए बिना ही जैसे वृक्ष उत्सव बना लेते हैं बिना किसी शोर के चिड़िया आती है चहचहा कर चली जाती हैं वैसे ही यह हृदय भी कितना कोमल और कठोर है बिना आवाज किए सह भी लेता है सहनशीलता की मिसाल पेश है फिर भी तुम्हारे नाम का जो दाग है वह हमेशा कायम है और हमेशा साथ रहेगा ।

निराधार बातों का आधार भी होता है सारी बातें निराधार कही जाती है जब हम आंतरिक रुप से चिंतन करते हैं तो सारी बातें फलीभूत होती हैं कितना सुखद वह समय था और कितनी गंभीर यादें इन से जब गुजरते हैं तो लगता है कुछ बात अभी शेष है जो कहनी है तुम्हें !