वर्तमान समय में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के आधार पर यदि देखा जाए भारतवर्ष के समाज मे त्याग व भोग का अद्भुत समन्वय है । साहित्यिक दृष्टिकोण के आधार पर आश्रम आंशिक पड़ाव है । अनवरत यात्राओं में समन्वय स्थापित करते हुए क्षणिक विश्राम कहा जाता है। इस प्रकार समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के आधार पर आश्रम व्यवस्था एक आयोजित व क्रमबद्ध जीवन शैली के आधार पर व्यक्ति पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष) के दायित्व को सरलता व सहजता के साथ नियमबद्ध होकर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है ।
आश्रम परम्परा ,आश्रम के वर्गीकरण के आधार पर व्यक्ति ,ज्ञान ,कर्म और व्यक्ति का समन्वय कर भोग व त्याग करते हुए पुरुषार्थ व पंचमहायज्ञ ,संस्कार की पूर्ति करते हुए आश्रम व्यवस्था के नियमों पर चल कर सुगमता की खोज कर समाज से गहरा तादात्म्य स्थापित करता है । आश्रम परम्परा अभियान के संस्थापक डॉ. पुष्कर मिश्र ने आश्रम परम्परा के अभियान को समृद्धि व श्रेयस्कर बनाने हेतु भारत भूमि पर समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए उपनिषद के श्रेयस व प्रेयस दोनो भागों के द्वारा धर्म व नीति के साथ मानव को जोड़ते हुए आश्रम परम्परा के उद्देश्य को बताते है –
” आश्रम परम्परा , व्यवस्था व इस लोक अभियान में आश्रम में समस्त देश की पीढ़ी व युवा वर्ग आश्रम परम्परा के आत्मसुख के साथ ही मूल स्वभाव की प्राप्ति कर स्वेच्छा व सहजता के साथ इस परम्परा में मनुष्य नैतिक बल व आध्यात्मिक बल के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए इस परम्परा के श्रेयस् छः तत्वों धर्म ,नीति ,न्याय , सत्य , मर्यादा, प्रेम के आधार पर जन-जन को बल के साथ नवीन दिशा व वाणी प्रदान करना है । “
डॉ० पुष्कर मिश्र ने आश्रम परपरा को समाज में स्थापित करने के पीछे जो मूल उद्देश्य है , आश्रम के उद्देश्य की यथार्थ परकता पर बल व समाज के उन्मूलों पर सामाजिक अध्ययन में वर्गीकृत आश्रम व्यवस्था को मिश्र ने ‘आश्रम परम्परा अभियान’ नाम से समाज मे स्थापित करने का विचार मिश्र जी अपने अध्ययन रत व शोध कार्य के समय मे ही 1995 ई० में प्रयाग कुम्भ में साधु -संतो व विभिन्न सम्प्रदायों पर अध्ययन के आधार पर आधात्मिक बल व मानव के नैतिक बल संतो के जीवन शैली व अष्टांग योग यम, निमय, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान ,समाधि पर बल देना तथा सम्पूर्ण विश्व मे आश्रम परम्परा के मार्ग का अनुसरण कर अष्टांग योग के आधार पर समाज व मानव के बीच नैतिक व आध्यात्मिक बल का समुचित विकास के साथ नियमों का आगामी पीढ़ी तक पहुंचाना व सुव्यवस्थित क्रम में लक्षित कर समाज विज्ञान व मानविकी के क्षेत्र प्रासंगिकता के आधार पर सम्पूर्ण भारतीय आश्रम परम्परा के आधार पर सर्वांगीण विकास कर सके ।
आश्रम व्यवस्था उपनिषदों में श्रेयस्कर (सबका कल्याण करने वाला, शुभदायक) बन सके। समाज शास्त्रीय अध्ययन में समाजपरक व साहित्यिक दृष्टिकोण में विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों के एक दूसरे में समाहित कर समस्त मानव को धर्म (बल) की नीति के आधार पर ज्ञान के मार्ग का बोध करते हुए आश्रम परम्परा व्यवस्था में नीति से सह सम्बन्ध स्थापित कर अधिक से अधिक लोंगो का लाभ हो । समस्त मानव पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सत्य ,साधक के रूप में अविरल मार्ग में साधना पथ पर लीन हो सके व मर्यादित बन सके यही सच्चे श्रम का उपयोग है ।
आश्रम परम्परा बढ़ती आयु के साथ सुनियोजित जीवन व कार्यो का एक सुंदर नियमबद्ध समन्वय है जिसमें विभिन्न आयु के लोग जुड़कर मानव सेवा भाव से उदात्त को प्राप्त करते है । मानव का जीवन ज्ञान व शक्ति का संचय है । आश्रम शब्द ‘श्रम’ धातु से बना है जिसका अर्थ है परिश्रम । यहाँ समस्त मानव को उद्यमी बनाने का प्रयास है । इस लोक अभियान से जुड़कर समस्त जन सफलता के मार्ग को निर्धारित कर सकेंगे ऐसा विश्वास है ।

आकांक्षा मिश्रा
गोंडा-उत्तरप्रदेश