चिन्तन की एक कड़ी

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आशा और निराशा के दोनों ध्रुवों के बीच ज़िन्दगी तैर रही है। जागरण में सुख के स्वप्न सँजोये वह पुतली की तरह चलती-फिरती है। उसका चम्पई तन सम्पर्कों की सारी सीमाओं को पार किये हुए है। उसकी फूल-सी बाँहों में बँधे हुए सपने पलकों की छाँह में पल रहे हैं। अधरों में, आँखों में– आकर्षण आसिंचन, मधुवर्षण उसके प्राण को जाग्रत् कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो सब कुछ होते हुए भी उसमें एक अतृप्त तृषा है, जिसका उद्देश्य– केवल गति, केवल गति; रुकना क्षणमात्र नहीं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ जुलाई, २०२२ ईसवी।)