भोपाल। किताब लिखना परिश्रम और कठिन साधना है। वर्षों तपस्या और सतत मेहनत के बाद कोई पुस्तक सामने आती है। मैं पथिक हूं काव्य संग्रह भी रचनाकार के परिश्रम और कठिन साधना का ही परिणाम है। जो अथक, अटल पथ पर है वो पथिक है। ये बातें वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं मप्र विधानसभा के सलाहकार पंकज शुक्ल ने कही।
साहित्यकार, विचारक कैलाश माकवे के काव्य संग्रह ’पथिक हूं मैं’ के विमोचन कार्यक्रम में पंकज शुक्ल बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे। इससे पहले कार्यक्रम की शुरूआत मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन के साथ हुई। इसके बाद मुख्य अतिथि पंकज शुक्ल, विशिष्ठ अतिथिगण श्रीगोविंद शर्मा, पयोज जोशी, सुदर्शन व्यास, कार्यक्रम के अध्यक्ष अशोक दुबे एवं रचनाकार कैलाश माकवे ने काव्य संग्रह ’पथिक हूं मैं’ पुस्तक का विमोचन किया। विमोचन कार्यक्रम मां दुर्गा सिद्धेश्वरी माता मंदिर पांच नंबर पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार आनंद शुक्ल ने किया। आभार प्रदर्शन सुमित शर्मा ने किया। इस अवसर पर रचनाकार कैलाश माकवे द्वारा अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं तुलसी के पौधे भेंट किए गए। कार्यक्रम में साहित्यकार, विचारक सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन व समाजजन भी उपस्थित रहे।
’पथिक हूं मैं’ 40 वर्षों की तपस्या है –
कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार एवं विप्र वाणी के प्रधान संपादक अशोक चन्द्र दुबे ’अशोक’ ने कहा कि काव्य संग्रह पथिक हूं मैं रचनाकार कैलाश माकवे की 40 वर्षों की तपस्या है। 70 के दशक में जब उन्होंने भोपाल आकर अपने जीवन की शुरूआत की और उस दौर में उन्होंने जो लिखा वह आज हमारे सामने काव्य संग्रह के रूप में प्रस्तुत है। ‘पथिक हूं मैं’ वर्षों तक उनके मन मस्तिष्क में नृत्य करती रही, कभी-कभी कुछ छलकती भी रही और आखिरकार अब यह रूपायित हो ही गई। यह पुस्तक पाठक को चिंतन, मनन के प्रवाह में अवगाहन को विवश कर देती है। विशिष्ठ अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्रीगोविंद शर्मा ने कहा कि साहित्य की रचना बेहद कठिन कार्य है, क्योंकि साहित्य को समझना और उसे लिखना बेहद कठिन तपस्या है। साहित्य कई कुर्बानी मांगता है। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ इसे अंगीकार करना बेहद कठिन तपस्या है।
पथिक हूं मैं काव्य संग्रह भी रचनाकार कैलाश माकवे की मेहनत और तपस्या है। युवा साहित्यकार, पत्रकार सुदर्शन व्यास ने कहा कि पथिक हूं मैं काव्य संग्रह में मैंने अपना बचपन जिया, जवानी जी, प्रौढ़ अवस्था के साथ ही वृद्धावस्था को भी जिया, क्योंकि यह संग्रह प्रेम है, विरक्ती है, आत्मद्धंद है। यह काव्य संग्रह जीवन को बेहद सरल रूप से देखना का तरीका है। रचनाकार ने इस काव्य संग्रह में अपने जीवन की छोटी-छोटी भावनाओं को बेहद साधारण तरीके से व्यक्त किया है।