वह वाक़िफ़ है, बस्ती मे नामर्द ही रहते हैं

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

नुमाइश करता और कराता है चालाकी से,
पर्दा गिराता और उठवाता है चालाकी से।
लोग उसके मुरीद अब भी हैं बनते देखो!
कटोरा हाथ में थमवाता है चालाकी से।
दर-दर की ठोकरें खाओ तो खाओ ठेंगे से,
अपनी हर बात मनवाता है चालाकी से।
ज़िन्दगी ऐसे मोड़ पर ठहरी देखो अब,
धमक से क़त्ल करवाता है चालाकी से।
कितना बारीक़ मुखौटा लगाकर जीता वह,
बात-से-बात निकलवाता है चालाकी से।
वह वाक़िफ़ है, बस्ती मे नामर्द ही रहते हैं,
हर महफ़िल मे रंग जमाता है चालाकी से।
देखो! हर मछली उसके काँटे की है दीवानी,
चारा फेंकता और फँसवाता है चालाकी से।
उसे अह्मक़१ समझने की भूल करना मत,
वह शातिर है, चाल चलवाता है चालाकी से।
★ शब्दार्थ– १अनाड़ी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज)