● पन्त के काव्य में मानवीय मूल्यों का रेखांकन
‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान में आज (२० मई) सौन्दर्यशिल्पी पं० सुमित्रानन्दन पन्त की जन्मतिथि के अवसर पर एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमें ‘हिन्दी-साहित्य’ से भिन्न कर्म करनेवाले विदुषी और विद्वज्जन की बहुसंख्या में सहभागिता रही।

मुंगेर विश्वविद्यालय, बिहार में संस्कृत-साहित्य के सहायक आचार्य डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय ने कहा, “कविवर्य सुमित्रानन्दन पन्त जी का प्रकृतिप्रेम उनके काव्य में यत्र-तत्र लक्षित होता है। ‘विराट’ और ‘पल्लव’ में संकलित उनके गीतों में सौन्दर्य की व्याप्ति का दर्शन होता है। कुल मिलाकर, पन्त जी का समग्र साहित्यिक जीवन “सत्यं शिवं सुन्दरम्” की स्थापना करता है।”

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार डॉ० अरुण प्रकाश का मत है, “सुमित्रानंदन पंत महात्मा गांधी जी से बहुत प्रभावित थे, और महात्मा जी के विचारों को केंद्र में रखकर कई कविताएँ लिखीं। यह पंत जी की भारतीय मूल्यों के प्रति निष्ठा के परिणाम के चलते भी हो सकता है; क्योंकि महात्मा जी ने राजनीतिक-सामाजिक संचेतना के तत्त्व के रूप में भारतीय मूल्यों की ही प्रतिष्ठापना की थी।”

राजकीय इण्टर कॉलेज, प्रयागराज में अर्थशास्त्र की प्रवक्ता सम्पदा मिश्र का कथन है, “पन्त जी छायावादी स्तम्भों में से एक थे। उस युगप्रवर्तक कवि ने भाषा की निखार और संस्कार देने के अलावा उसके प्रभाव को भी सामने लाने का प्रयत्न किया। वे मानव-सौन्दर्य और आध्यात्मिक चेतना के कवि थे।”

खागा-फ़तेहपुर के पत्रकार-फ़िल्मकार अमित राजपूत का मानना है, “काव्य के कलापक्ष की भाँति भाव-पक्ष के क्षेत्र में भी सुमित्रा नंदन पंत जी दक्ष कवि थे। उन्हें प्रकृति-चित्रण और महर्षि अरविन्द के आध्यात्मिक दर्शन पर आधारित रचनाओं का श्रेष्ठ कवि माना जाता है।”

गोण्डा में गणित-विषय के अध्यापक घनश्याम अवस्थी के अनुसार, “कविवर पन्त जी की जीवन्त चित्रात्मक भाषा-शैली शुद्धता के साथ भाव-प्रवाह में भी अप्रतिम है। यह विशेषता उन्हें अन्य कवियों से पृथक् करती है।”

परिसंवाद-आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “पन्त जी जीवन के अधिक निकट पहुँचकर उसे कल्पना की दृष्टि से न देखकर, वास्तविक दृष्टि से देखते हैं, तब उन्हें जीवन कहीं अधिक कठोर, कटु और अधिक भयावह दिखायी देता है।”

वाराणसी में अध्यापिका प्रतिभा मिश्र ने पन्त जी के कर्तृत्व के विषय में बताया, “प्रकृति के कुशल चितेरे पन्त; मानवीकरण का अद्भुत चित्रण; दार्शनिक और रहस्यमयी कवि अद्वितीय कोमलता और सुकोमल भावना के कवि; विश्व-बन्धुत्व की भावना से ओतप्रोत तथा मातृत्व-भावना से पूरित रचनाएँ।”

शासकीय महाविद्यालय, हटा (दमोह) में हिन्दी-विषय की सहायक प्राध्यापिका आशा राठौर का मत है, “छायावादी कवियों में सर्वाधिक काव्यरचना पंत जी ने ही की है। ‘चिदंबरा’ काव्य-संग्रह के प्रणयन के लिए उन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ऐसे महान् साहित्यकार काल का अतिक्रमण करते हुए, सदैव साहित्याकाश में विद्यमान रहते हैं।”

प्रयागराज की कवयित्री उर्वशी उपाध्याय ने कहा,”पंत का अलंकारिक, दार्शनिक, मानवीकरण नारीरूप का चित्रण और हर प्रकार की काव्यरचना अद्भुत है।”

प्रयागराज के साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने कहा, “पंत जी प्रकृति प्रेम के बाद लौकिक प्रेम के भावात्मक जगत् में प्रवेश करने के साथ-साथ यौवन के सौन्दर्य तथा संयोग-वियोग की अनुभूतियों की मार्मिक व्यंजना की थी।”

इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में हिन्दीविभाग में प्राध्यापक शिवप्रसाद शुक्ल ने कहा, “कवि पंत हिन्दी-कविता के नक्षत्र स्वरूप हैं, भारतीयता के धरोहर हैं, संघर्ष से आद्यंत जूझते रहे, छायावाद पर उनकी महत्त्वपूर्ण टिप्पणी कविता का मार्ग प्रशस्त कर रही है।”

प्रयागराज में अध्यापक प्रदीप तिवारी ने कहा,”पन्त जी-द्वारा
प्रकृति को केंद्रीय भाव में रखकर किया गया साहित्य सर्जन मानव- सभ्यता को प्रकृति के संरक्षक होने का दायित्व बोध कराता है।”

भोपाल में शोधच्छात्रा अनुभूति शर्मा ने कहा,”पंत के मन में सौंदर्य के प्रति दृढ़ आस्था रही है। सुंदरता उन्हें तभी अच्छी लगती है जब वह सत्यं और शिवं से समन्वित हो।”

प्रयागराज की कवयित्री चेतना चितेरी ने कहा, ”प्रकृति के कुशल चितेरे कवि पंत ने अपने कोमल भावनाओं की कमनीयता से कामिनी का अनुपम शृंगार करते हुए, हिंदी-साहित्यजगत् में मानवतावादी दृष्टिकोण का रूपायन किया है।”

गढ़ाकोटा (सागर) के शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी-विभागाध्यक्ष डॉ० घनश्याम भारती ने कहा, “पन्त जी की माँ का बचपन में देहान्त हो गया था, अतः उन्होंने प्रकृति को ही अपनी माँ समझकर इसका मानवीकरण किया।”
इस प्रकार बौद्धिकता से पूर्ण आयोजन का समापन हुआ।