अलग-अलग चश्मे से परीक्षाओं को देख रही सरकार

'सर्जनपीठ' का बौद्धिक परिसंवाद -कार्यक्रम सम्पन्न

‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान में ८ जून को आयोजित राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद में देश के अनेक प्रबुद्धजन ने ‘कोरोना के भय की आड़ में परीक्षा-संदर्भ में केन्द्र और राज्य-सरकारों की दोहरी नीति’ विषय पर अपने विचार प्रकट किये थे।

आगरा से अध्यापिका राजश्री सिंह ने कहा, “बच्चों की जान से खिलवाड़ उचित नहीं है। देश के लाखों बच्चों की ज़िंदगियाँ खतरे में नहीं डालनी चाहिए । जीवन सुरक्षित रहेगा तो परीक्षाएँ भी होती रहेंगी । सरकार विकल्प के रूप में ऑनलाइन परीक्षाएँ करा सकती हैं।”

शकुन्तला, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, आई० बी० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पानीपत, हरियाणा का मानना है, “सरकार को ऑनलाइन परीक्षाओं का आयोजन करवाते हुए ग़रीब विद्यार्थियों को लैपटॉप या टैबलेट उपलब्ध करवाने चाहिए। जिन क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहाँ के विद्यार्थियों को परीक्षा केन्द्र में बुलाकर कोरोना मापदण्डों का पालन करते और करवाते हुए परीक्षा लेनी चाहिए। जिससे विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनका भविष्य भी सुरक्षित रहे।”

परिसंवाद-आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का मत है, “सरकार विद्यार्थियों की परीक्षाओं को अलग-अलग चश्मे से क्यों देख रही है? कभी वह ”जान है तो जहान” का नारा बलन्द करती है तो कभी ठीक उसके विपरीत काम करती है। चुनावी सभा में लाखों की भीड़ बुलवाकर केन्द्र और राज्य-सरकारों ने कौन-से संदेश दिये थे? यदि परीक्षाओं को रद्द करना ही है तो सभी परीक्षाएँ रद्द करें।”

प्रयाग से प्राचार्य डॉ० पूर्णिमा मालवीय ने कहा, “दो वर्षों से पठन-पाठन का माहौल ही नहीं बन पा रहा है। विद्यार्थियों की परीक्षा इन्हें टालनी ही नहीं चाहिए थी। पंचायत चुनाव टाला जा सकता है। जो पूरे वर्ष मेहनत से पढ़ते हैं, वे परीक्षा भी देना चाहते हैं और परिणाम भी पाना चाहते हैं। प्रमोशन कोई विकल्प नहीं है।”

लखनऊ से गृहिणी मधु गोयल ने कहा, “महामारी के कारण उत्पन्न अनिश्चितता के चलते परिस्थिति के सामान्य होने की प्रतीक्षा में विद्यार्थियों का भविष्य दाँव पर लगाया जाना उचित नहीं है। वैसे भी विज्ञान के इस युग में कोई भी कार्य असंभव नहीं है, बल्कि अधिकांश कार्य बेहतर और सुविधापूर्ण तरीके से सम्पन्न हो रहे हैं, अतः सुरक्षित रूप से, अविलम्ब परीक्षाएँ आयोजित की जानी चाहिए।”

आरती जायसवाल, साहित्यकार, रायबरेली ने कहा, “विगत कई वर्षों के डिग्रीधारी विद्यार्थी जो अब ‘अभ्यर्थी’ हैं, उनका भविष्य भी स्वर्णिम नहीं है और अधिकांश को न नौकरी मिलती है न रोजगार। ऐसे में इन परीक्षाओं का औचित्य किसी के जीवन से बढ़कर नहीं है।”