आज 25 जून है, आपातकाल की घोषणा की पैंतालीसवीं बरसी

– डॉ. निर्मल पाण्डेय (इतिहासकार)

डॉ• निर्मल पाण्डेय

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का न मिटाया जा सकने वाला काला अध्याय है, जिसपर कांग्रेस और उन्ही के धन-यश-सुविधा पर पलने वाले कम्युनिस्टों-सोशलिस्टों से इतर आज भारतवर्ष के लिए कृतसंकल्पित मानस से लैस इतिहासकारों द्वारा लेखनी चलाने का समय आ गया है. यही आपातकाल के दौरान संघर्षरत रहे नागरिकों के राष्ट्रीय चैतन्य और लोकतान्त्रिक भारतभाव के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

क्या ही बढ़िया हो यदि 2025 में जब हम इस काले अध्याय की पचासवीं बरसी मना रहे हों तो हमारे पास नव-स्रोतों (जो आपातकाल के इतने वर्षों बाद अब पब्लिक डोमेन में आ चुके हैं/हों) के आधार पर आपातकाल का प्रामाणिक और नव-इतिहास समेटे कुछ नए ग्रन्थ हों. क्यूंकि अब तक तो जो कुछ भी है, उनमें अधिकांश आपातकाल के खलनायकों का शौर्य गान ही है.

तारीख : 26 जून 1975; समय : सुबह के आठ बजे.

आकाशवाणी पर समाचारों का समय. समाचारवाचक की जगह स्वयं श्रीमती इंदिरा नेहरु गाँधी की आवाज. अचानक राष्ट्र के नाम संदेश का प्रसारण,

सूचना : राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत देश में आपातकाल घोषित;

स्पष्टीकरण : आंतरिक अशांति से निबटने के लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक.

1975 का जून महीना अपने पूरे गर्म तासीर के साथ आया और स्वातंत्रयोत्तर भारत को ऐसे कड़वा स्वाद चखाया जिसकी याद भर किसी भी जम्हूरियत पसंद आदमी के सिर्फ देह ही नहीं दिलो-दिमाग में भी एक सिहरन की लहर दौड़ा देने के लिए काफ़ी है. 25 जून 1975 को आतंरिक कारणों से लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अपनी स्याह छाप के लिए जाना जायेगा.

संभवतः इस तानाशाही कदम के मूल में इसी जून महीने की ही एक तारीख जिम्मेदार थी और वह था 12 जून 1975. यह दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सुनाये गए एक ऐतिहासिक निर्णय का दिन था. 1971 के आम चुनावों में इंदिरा गाँधी से राय बरेली से चुनाव हारने वाले एक समाजवादी नेता राजनारायण की अर्ज़ी पर फैसले का दिन था. उस अर्ज़ी में प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी पर भ्रष्ट आचरणों, जिनमे नियमों से अधिक धन और सरकारी अधिकारियों और मशीनरी के इश्तेमाल का आरोप था. न्यायालय ने इंदिरा गाँधी खिलाफ फैसला सुनाते हुए उनके 1971 के चुनाव में मिली जीत को रद्द करते हुए उनपर अगले छः वर्षों तक लोक सभा चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले से इंदिरा गाँधी बौखला गयीं.

दूसरी तरफ इंदिरा गाँधी को देशभर में सड़कों पर चुनौती देने वाले विरोध-प्रदर्शनों और हडतालों के प्रतीक पुरुष बन चुके जयप्रकाश नारायण ने ‘जनता का दिल बोल रहा है, इंदिरा का सिंहासन डोल रहा है’ और ‘सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है’ के नारों और आह्वाहन के साथ 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल जन सभा की.

सभा में इकठ्ठे लगभग 75000 लोगों के उफनते असंतोष का जवाब इंदिरा गाँधी ने दमन से दिया. ब्रिटिश राज से विरासत में मिले और भारतीय संविधान में सावधानीपूर्वक सुरक्षित रखे गए तानाशाही अधिकारों का सहारा लेकर इंदिरा गाँधी ने 25 जून को देश में आपातकाल लागू करने की उद्घोषणा पर मुहर लगवा लिया. लोक तांत्रिक अधिकार और न्यायिक प्रक्रियाओं सहित लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माने जाने वाली मीडिया को निलंबित कर दिया गया.

जेपी ‘बिहारवासियों के नाम चिट्ठी’ में इसे याद करते हुए लिखते हैं, ’25 जून 1975 तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र था, 26 जून 1975 से वह एक अधिनायकतंत्र में तब्दील कर दिया गया. इससे लोकतंत्र का सम्पूर्ण वध तो नहीं हुआ पर वह सिसक रहा है, दम तोड़ रहा है… 25 जून तक जनता देश की मालिक थी, आप देश के मालिक थे, आपके वोट से इस मुल्क की किस्मत बनती-बिगड़ती थी, परन्तु 26 जून से आपका यह अधिकार छिन गया, लोकशाही के स्थान पर एक व्यक्ति की तानाशाही कायम हो गयी…’

‘…इंदिरा को अपने दल के लोगों तक परा भरोसा नहीं रह गया था. यह सच है कि उनके अपने कई सांसद यह चाहते थे कि वो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे, लोकतान्त्रिक परम्पराओं की रक्षा करें और अपने स्थान पर कांग्रेस दल के किसी और नेता को प्रधानमंत्री बनने दें. पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुईं, उन्हें शायद यह भय था, कि एक बार हटने पर फिर कभी वो प्रधानमंत्री न बनने पाएं. इसलिए आपातकाल लगा कर उन्होंने विरोध में उठने वाले हर स्वर को कारागार में कैद करना चाहा.’ यहाँ तक कि अपने ही युवातुर्क चन्द्रशेखर, रामधन और आगे चलकर मोहन धारिया तक को उन्होंने नहीं बक्शा, वे भी पकड़कर जेल में डाल दिए गए.

तुम प्रतिनिधि नहीं रहे हमारे कुर्सी गद्दी छोड़ दो

भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी को दूर करने और शिक्षा-व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए उठे जनांदोलन के दौरान जब 18 मार्च 1974 को बिहार विधानसभा के सामने सत्याग्रही छात्रों-युवकों पर पुलिसिया कहर बरपाया गया. बाद में आठ अप्रैल 1974 को ऐतिहासिक मौन जुलूस के बाद इस स्वतःस्फूर्त आन्दोलन को कुचलने की कोशिशों ने विधानसभा विघटन की मांग जोर-शोर से उठाई. ‘तुम प्रतिनिधि नहीं रहे हमारे, कुर्सी गद्दी छोड़ दो’ के नारे के साथ यह मांग उठी. हालांकि ‘बिहार छात्र संघर्ष समिति’ की सञ्चालन समिति के नेताओं से जेपी ने कहा, ‘कि सरकार के इस्तीफे और विधानसभा के विघटन की मांग उचित नहीं.’ जेपी का मानना था कि इससे शायद सरकारी नेताओं की सुबुद्धि जागे, पर ऐसा हुआ नहीं. उलटे उन्होंने घोर दमन की नीति अपनाई और शांतिपूर्ण सत्याग्रही छात्रों-युवकों पर लाठी गोली से प्रहार करना शुरू किया. इन्हीं परिस्थितियों ने जेपी को इस आन्दोलन की कमान थामने को आगे किया.

तो क्या नानाजी देशमुख ने बचायी थी जेपी की जान?

5 जून 1974 को पटना के गाँधी मैदान में विशाल जन-प्रदर्शन जिसमें जेपी ने सम्पूर्ण क्रांति का उद्घोष किया, विस्तार से उसके दर्शन और कार्यक्रम को जानने के लिए जयप्रकाश नारायण कृत सम्पूर्ण क्रांति की खोज में मेरी विचार यात्रा (भाग-दो) देखना प्रासंगिक होगा, सर्व सेवा-संघ प्रकाशन से प्रकाशित इस कृति को कांतिभाई शाह ने सम्पादित किया है.

5 जून 1974 को बिहार के कोने-कोने से आए लाखों लोगों से उपजे विशाल जन-प्रदर्शन को याद करते हुए जेपी ‘बिहारवासियों के नाम चिट्ठी’ में लिखते हैं, ‘कि सरकार के इस्तीफे और बिहार विधानसभा के विघटन की मांग तक से सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी… अंत में 4 नवम्बर 1974 को मेरे नेतृत्व में एक ऐतिहासिक कूच पटना में हुआ. जिसे रोकने और विफल करने के लिए केन्द्रीय रक्षा पुलिस (सी.आर.पी.) ने अन्धाधुंध अश्रु-गैस के गोले और लाठियां बरसायीं, जिसमे सैकड़ों लोग घायल हुए. मैंने भी उनकी लाठी की मार खायी. यह हुआ केंद्र-सरकार के इशारे पर, क्योंकि बिहार की सरकार में खुद ऐसा करने की हिम्मत नहीं थी.

अगर श्री नानाजी देशमुख और अन्य लोगों ने मुझे बचने के लिए सी.आर.पी. की लाठी का वार अपने ऊपर झेल न लिया होता, तो उसी दिन मेरी लाश निकल जाती.’

फासिस्ट कौन?

इंदिरा सरकार ने ‘इमरजेंसी क्यों’ नाम की पुस्तिका द्वारा ‘आपातकाल के विरुद्ध’ खड़े हुए हर आवाज को दबाने के लिए बहुतेरी मन-गढ़ंत बातें कही गयीं. बिहारवासियों के नाम चिट्ठी’ में जेपी बताते हैं, कि आन्दोलन को आनंदमार्गियों से जोड़ने के कुत्सित प्रयास हुए. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ पर सम्प्रदायवादी होने के आरोप लगाये गए. जबकि यह तथ्य है कि इन संगठनों के युवकों ने आन्दोलन में मुस्लिम युवकों-छात्रों के साथ कंधे-से-कन्धा मिलकर काम किया. सर्वधर्म समभाव (जिसे अंग्रेजी में सेकुलरिज्म कहते हैं) का आदर्श इस सम्पूर्ण-क्रांति आन्दोलन की एक बड़ी देन है, इससे कोई भी तटस्थ व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता.’ सम्प्रदायवाद को मिटाने की तब तक हुई कोशिशों में जेपी इसे सबसे भिन्न, और सबसे रचनात्मक कोशिश मानते हैं.

जेपी इस बात को स्पष्ट करते हैं कि, ‘इंदिरा और उनके छुटभैय्यों ने हमारे आन्दोलन को फासिस्ट कहा है, क्योंकि इसमें आर.एस.एस. और जनसंघ शामिल था. दरअसल इंदिरा गाँधी का जो भी विरोध करता है, वह प्रतिक्रियावादी और फासिस्ट बन जाता है. फासिज्म का उदय सर्वप्रथम मुसोलिनी और हिटलर के देशों में हुआ था, वहां का इतिहास जानने और समझने वाले बताते हैं कि इंदिरा गाँधी आज उन्हीं फासिस्ट देवताओं के चरण-चिन्हों पर चल रही हैं. इसलिए अगर इस देश को फासिज्म का खतरा है, तो वह इंदिरा गाँधी की तरफ से है. लोकतंत्र को कुचलकर फासिज्म की बुनियाद उन्हीं के कर-कमलों से डाली जा रही है.’

दरअसल आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का न मिटाया जा सकने वाला काला अध्याय है, और इस पर अभी तक कांग्रेस और उन्ही के धन-यश-सुविधा पर पलने वाले कम्युनिस्टों-सोशलिस्टों ने ही कलम चलाई है. उनसे इतर भारतवर्ष के लिए कृतसंकल्पित मानस से लैस इतिहासकारों द्वारा लेखनी चलाने का अब समय आ गया है. क्या ही बढ़िया हो यदि 2025 में जब हम इस काले अध्याय की पचासवीं बरसी मना रहे हों तो हमारे पास नव-स्रोतों (जो आपातकाल के इतने वर्षों बाद अब पब्लिक डोमेन में आ चुके हैं/हों) के आधार पर आपातकाल का प्रामाणिक और नव-इतिहास समेटे कुछ नए ग्रन्थ हों. क्यूंकि अब तक तो जो कुछ भी है, उनमें अधिकांश आपातकाल के खलनायकों का शौर्य गान ही है ।

यही आपातकाल के दौरान संघर्षरत रहे नागरिकों के राष्ट्रीय चैतन्य और लोकतान्त्रिक भारतभाव के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

उपरोक्त में प्रमुखतः जहाँ से सन्दर्भ लिए गए हैं, उनमें प्रमुख हैं: जयप्रकाश नारायण कृत ‘मेरी विचार यात्रा (दो भागों में), सर्व सेवा संघ-प्रकाशन, वाराणसी, और ‘बिहारवासियोंके नाम चिट्ठी’, तरुण क्रांति, संघर्ष कार्यालय, पटना ।