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गाँधी, नमक क़ानून और सविनय अवज्ञा आन्दोलन

एक जीवन शैली के रूप में हर हिन्दुस्तानी में हिन्दुत्व की मौजूदगी उस नमक की तरह ही है, जिसके बिना जीवन का बेस्वाद होना तय है।

नमक?

जी हाँ…

यहाँ इस आबोहवा में कुछ नहीं चलता अगर पानी और नमक ना हो तो… और उसपर कंट्रोल का मतलब है हिंदुस्तान की नब्ज़ पर कंट्रोल ।
-(संवाद सीधे-सीधे रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ से )

…और इसी नब्ज़ को दबाया महात्मा गांधी ने डाण्डी मार्च के द्वारा, आज ही के दिन 12 मार्च 1930 को शुरू कर और 6 अप्रैल 1930 को नमक क़ानून तोड़कर …यह सविनय अवज्ञा थी ।

गांधीजी ने अपने 78 स्वयं सेवकों, जिनमें वेब मिलर भी एक था, के साथ साबरमती आश्रम से 358 कि.मी. दूर स्थित डाण्डी के लिए प्रस्थान किया । यही डाण्डी मार्च था. महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को यात्रा के आखिरी दिनों में अपना पड़ाव बनाया था । नवसारी से डाण्डी का फासला लगभग 13 मील का है । आज ही के दिन 12 मार्च 1930 को शुरू हुआ यह मार्च; 24 दिनों के बाद 6 अप्रैल, 1930 को डाण्डी पहुंचा, जहाँ गांधीजी ने समन्दर किनारे अपनी भिंची हुयी मुट्ठियों में नमक उठाकर नमक क़ानून को तोड़ा ।

सनद रहे, औपनिवेशिक भारत में बर्तानिया हुकूमत ने नमक बनने और उसके विक्रय पर भारी मात्रा में टैक्स लगा दिया था । नमक का सामान्य भारतीय जीवन में अति-आवश्यक आवश्यकता होने के कारण देशवासियों को इस कानून से मुक्त करने और अपना अधिकार दिलवाने हेतु गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को जन्म दिया । यह आंदोलन पूरे एक साल चला और अपने चरम पर इसने ब्रिटिश हुक्मरानों को 1931 के गांधी-इर्विन समझौते के लिए बाध्य किया ।

साम्राज्य-विरोधी अभियान हेतु एक सार्वभौम-सार्वजनीन प्रतीक के तौर पर गांधीजी द्वारा नमक का चुनाव अनायास नहीं था, बल्कि सावधानी से चुना हुआ यह एक सायास प्रयास था । दरअस्ल, नमक ऐसी चीज थी जिसका राब्ता ऊँच-नीच, शिक्षित-अनपढ़, गरीब-अमीर, जातिभेद, भाषाभेद और प्रांतभेद से परे हर आम-ओ-ख़ास से पड़ता था, गांधीजी द्वारा चलाये गए असहयोग और उससे भी पहले के आन्दोलनों से प्रभावित ‘लगान देने वाले किसान-मजदूरों’, विदेशी कपडे-शिक्षा-डॉक्टरी-रेल सेवा आदि इस्तेमाल करने वाले उच्च एवं मध्यमवर्गीय लोगों से ज्यादा बड़ी संख्या को लक्षित किया । यही सविनय अवज्ञा की सफलता थी । यह संभवतः पहली बार था जब बर्तानिया हुकूमत बराबरी के स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से बातचीत के लिए तैयार हुई ।

गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन में एक सार्वभौम-सार्वजनिक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किये गए नमक की तरह ही आज फिर डाण्डी की हाण्डी में हिन्दुत्व का विचार डालने की आवश्यकता है, अनेकता में एकता की हिन्दुस्तानी खिचड़ी तभी बनेगी । एक जीवन शैली के रूप में हर हिन्दुस्तानी में हिन्दुत्व की मौजूदगी उस नमक की तरह ही है, जिसके बिना जीवन का बेस्वाद होना तय है।।


संलग्न चित्र नमक सत्याग्रह की याद में सरदार पटेल मार्ग-मदर टेरेसा क्रिसेंट पर स्थापित ‘ग्यारह मूर्ति’ का है, जिसे मूर्तिकार देवीप्रसाद राय चौधरी ने तैयार किया था । इसमें सरोजनी नायडू, चीफ जस्टिस अब्बास तैयबजी सहित मातंगीनी हज़रा आदि को मूर्त रूप दिया गया है ।

दसवीं मूर्ति को देखिए, ग्यारहवें का हाथ पकड़ मानो कह रहा हो, ‘थकना नहीं है साथी, रुकना नहीं है साथी, उठना है, और बढ़ चलना है’ ।

डॉ० निर्मल पाण्डेय (व्याख्याता/लेखक/इतिहासकार)

डॉ• निर्मल पाण्डेय