● फ़ादर बुल्के हिन्दी, वाल्मीकि तथा तुलसीदास के परम भक्त थे
फ़ादर कामिल बुल्के भारत के समस्त विद्यार्थियों की जिह्वा पर हैं। ऐसा इसलिए कि उनका अँगरेज़ी-हिन्दी कोश और हिन्दी-अँगरेज़ी कोश से सभी लाभान्वित होते आ रहे हैं। शुद्ध शब्द ‘अँगरेज़ी’ का विस्तार करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। हिन्दी सीखने के लिए बेल्जियम से एक २६ वर्षीय युवा का भारत आना और बिहार, दार्ज़िलिंग आदिक स्थानों में संस्कृत-हिन्दी का ज्ञान प्राप्त करना और उसका विस्तार करना, कितनी गरिमामयी बातें हैं। ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’, ‘मानस कौमुदी’, ‘मुक्तिदाता’, ‘नया विधान’ का लेखन तथा बाइबिल का हिन्दी- अनुवाद करते हुए, फ़ादर कामिल बुल्के ने अपनी हिन्दीप्रियता सार्वजनिक की थी।

१७ अगस्त को फ़ादर कामिल बुल्के की पुण्यतिथि पर ‘सर्जनपीठ’ की ओर से आयोजित एक सारस्वत समारोह में अध्यक्षता करते हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने बताया, “कामिल जी ने हिन्दीभाषा का प्रचार-प्रसार करने में यथाशक्य योगदान किया था। हमारे सम्मेलन से उन्होंने ‘विशारद’ शिक्षा अर्जित की थी, जो हमारे लिए गौरव का विषय है।”

मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर श्रीवास्तव ने कहा,”वे उपेक्षित की जा रही देशज भाषाओं को विकसित करने के प्रयास में लग गये थे। उनकी ज्ञानपिपासा अनन्त थी। वे हिन्दी, वाल्मीकि तथा तुलसी के प्रति समर्पित रहनेवाले प्रथम अभारतीय विद्वान् थे, जिन्हें १९५० ई० में भारत की नागरिकता दी गयी थी।”

आयोजक भाषाविद् और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया, “फ़ादर कामिल बुल्के ने भारत में अपने लिए सर्वाधिक अध्ययनयोग्य स्थान इलाहाबाद को माना था। वे इलाहाबाद को अपना मायका और महादेवी वर्मा को ‘दीदी’ मानते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मात्र पाँच विद्यार्थियों को लेकर हिन्दीविभाग की स्थापना करनेवाले अपने गुरु प्रो० धीरेन्द्र वर्मा के सान्निध्य में उन्होंने अपने हिन्दीज्ञान में वृद्धि की थी और ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ विषय पर पीएच०डी० की उपाधि अर्जित की थी। वे भारत को स्वदेश मानते थे। अन्तत: १७ अगस्त, १९८२ ई० को दिल्ली में उनका शरीरान्त भी हुआ था।”

विद्वान् विचारक पं० रहसबिहारी द्विवेदी (जबलपुर) ने बताया, “कामिल बुल्के का ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ विषयक शोधप्रबन्ध में वैदिक और लौकिक वाङ् मय का तलस्पर्शी अध्ययन रेखांकित होता है।”

शिक्षक-समीक्षक डॉ० विभूराम मिश्र ने बताया, “यूरोप के बेल्जियम से ईसाई मिशनरी के रूप में भारत आये फ़ादर कामिल बुल्के भारतीय भाषाओं और भारतीय संस्कृति के प्रति अपने गहरे लगाव और योगदान के लिए जाने जाते हैं। इंडोलॉजी के अनेक यूरोपीय विद्वज्जन के बीच वे इस मामले में विशिष्ट हैं कि भारत और भारतीयता का उनका ज्ञान अधूरी जानकारी और यूरोपीय श्रेष्ठता बोध के पूर्वग्रह से दूषित नहीं है।”