यदि दीपावली ‘मुसलमानो’ का त्योहार होता….

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

यदि दीपावली मुसलमानो का त्योहार होता तो अब तक कई याचिकाएँ न्यायालयों मे दाख़िल हो जातीं। दोष मढ़ा जाता :– दीपावली से शोर-शराबा होता है; हमारे देवी-देवताओं के चित्र चिपकाकर तरह-तरह की आतिशबाज़ी की बिक्री होती है। उनमे आग लगाकर हमारे देवी-देवताओं को भी जला दिया जाता है। हनुमान छाप, लछिमी छाप, गड़ेस छाप, उल्लू छाप गड्डा और चक्करी मे आग लगाकर भड़्-भड़् बजाते हैं और खुली गलियों और सड़कों पर नचाते भी हैं। याचिकाओं मे यह भी उल्लेख रहता :– आतिशबाज़ी से वातावरण प्रदूषित होता है तथा प्रकाश से हमारी आँखें चौपट होने का ख़तरा बना रहता है। मसाजिद (‘मस्जिदों’ अशुद्ध है।) से रॉकेट हमारे मन्दिरों को निशाना बनाकर फेंके जाते हैं। सुबूत के रूप मे मन्दिर मे एक ट्रॉली जले-अधजले पटाख़े, राकेट, नादिर शाह, चंगेज़ ख़ान, जुम्मन मियाँ छाप वाले बम और चकरी के खोखे फेंकवा दिये जाते। सबसे ज़्यादा शिकायत रहती– इनसे हमारी नीद (‘नींद’ अनुपयुक्त शब्द है।) मे ख़लल पड़ता है, (‘ख़लल पड़ती’ अशुद्ध है। इसलिए इस त्योहार को बन्द कराया जाये।

हमारे न्यायाधीशवृन्द भी इस बात को समझकर सुकून का एहसास (‘अहसास’ अशुद्ध है।) कर रहे होंगे– चलो; अच्छा रहा, यह मुसलमानो का त्योहार नहीं रहा, वरना ‘रगड़ा’ मे हम भी नाहक रगड़े जाते।

चच्चा खुर्रम अली भी चैन की साँस ले रहे होंगे– चलो इ दीवाली-फीवाली अपना त्योहार नहीं रहा, वरना बर्ख़ुरदार “लेने के देने” पड़ जाते।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)