सत्याधार ‘सत्या’
पल प्रति पल लाचारी होती , जीना भी दूभर हो जाता ,
दिल का दर्द बयां करने को अगर मुझे अल्फाज न मिलते।
उसने इस लायक भी मुझको समझा कभी नहीं जीवन में ,
जिसकी प्रतिमा लिए हुए मैं , घूम रहा हूँ अपने मन में ।
दर्द पार कर गया इंतहां , आँखें बरसाती हैं आँसू ,
सब -कुछ खोकर भी मैने क्या पाया है इस पागलपन में ?
शायद मेरा ये बैरी मन मुझ पर हावी हो ही जाता,
अगर मुस्कराती आँखों की गहराई के राज न मिलते ।
मैने अपनी इस हालत का दिल को जिम्मेदार बताया ।
रोते रहे मगर चेहरे पर , ख़ुशियों का दरबार लगाया ।
कर्तव्यों की बलिवेदी पर मरण हो गया ज़ज़्बातों का ,
बेची ख़ुशिया, मोल लिए ग़म ,जीवन को बाज़ार बनाया ।
कैसे गाते गीत प्रेम के तूफानों में हम भी ‘सत्या’ ?
अगर जि़न्दगानी में मुझको दर्द भरे सुर – साज न मिलते ।