स्वरूपरानी चिकित्सालय, इलाहाबाद को बरबाद करनेवाले डॉक्टरों का चरित्र-चाल-चेहरा

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय – 


अन्वेषणात्मक पत्रकारिता 


”हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता” !..?

आज मैंने सोचा— चलो ‘पत्रकारिता’ करते हैं। एक-एक रुपये की तीन पर्चियाँ बनवायीं— पहला हृदय-रोग का, दूसरा पुरुष-ग्रंथि-रोग का तथा तीसरा अस्थि-रोग का। ऐसा इसलिए कि कई दिनों से इन विभागों की अनियमितताओं की सूचना पाकर क्षुब्ध था; अन्तत:, सब्र का बाँध हिल गया।
पहले मैं हृदय-रोग के चिकित्सक डॉ० अमिताभ शुक्ला से मिला। मैंने बताया— सीने में दर्द होता-रहता है। उन्होंने नहीं देखा, उनके कनिष्ठ चिकित्सक ने देखा था। डॉ० अमिताभ शुक्ला ने मुझसे प्रश्न किया— आप क्या करते हैं ? मैंने कहा– लेखन-कर्म। उनके पल्ले नहीं पड़ा फिर मैंने कहा– ‘राइटर’ हूँ। इस पर डॉ० अमिताभ शुक्ला ने कहा— राइटर! राइटर क्या होता है? इस पर मैं मौन होकर उनके चेहरे को पढ़ता रहा और उनका कनिष्ठ चिकित्सक उनकी ओर आश्चर्यात्मक भाव के साथ देखता रह गया। मैं तत्काल उठा और चल दिया।
उसके पश्चात मैं ‘मेडिसिन-ओपीडी (कक्ष-संख्या :२/१९ ) पहुँचा। वहाँ डॉ० अनुभा गुप्ता बैठी हुई थीं। मुझे कर्मचारी ने अन्दर आने के लिए कहा। मैं जब अन्दर पहुँचा तब डॉ० अनुभा गुप्ता लगभग ७० वर्षीय एक महिला का उपचार कर रही थीं। उस महिला के साथ एक युवक भी था। उस महिला का परीक्षण करते हुए, डॉ० अनुभा गुप्ता उस युवक की ओर लपक कर बोलीं, यह तुम्हारी आँख कैसी दिख रही है। तुम्हारे मुँह पर कभी लकवा मारा था न?” सकपकाते हुए उस युवक ने ‘नहीं’ का संकेत किया। इस पर डॉ० गुप्ता ने कहा, “तुम्हारी शादी कौन करेगा?” फिर मुख्य काम छोड़कर उस महिला डॉक्टर ने अपने कनिष्ठ चिकित्सकों को उसका परीक्षण करने के लिए निर्देश किया। वह सन्तुष्ट नहीं हुई और वहाँ रोगियों को छोड़कर उस कथित युवक का परीक्षण करने लगी। उसी बीच ६५-७० वर्ष का एक व्यक्ति अपने साथ किसी अति गम्भीर रोग से पीड़ित एक महिला रोगी को ले आया। डॉ० अनुभा गुप्ता उसे भी मुख्य मार्ग से भटका कर, अपने परिवार के सम्बन्धों के साथ उस व्यक्ति को जोड़ने लगी। वह व्यक्ति भी एक-के-बाद-एक अप्रासंगिक सूत्र पिरोने लगा, जबकि उसके साथ आयी रुग्ण महिला दर्द से कराह रही थी। मेरा धैर्य चूक गया और मैं डॉ० अनुभा गुप्ता और उसकी उपचार-शैली को कोसते हुए, बुदबुदाते हुए, पर्ची उसके सामने फाड़ कर, निकल आया।
अब मैं पहुँचा, ‘अस्थि-विभाग’। वहाँ पर डॉ० मुकुल सिंह बैठे थे। वहाँ मैंने बताया कि मेरी एड़ी की हड्डी दो वर्षों-पूर्व टूट गयी थी, अब बहुत दर्द होता है। इस पर डॉ० मुकुल सिंह ने अपने कनिष्ठ चिकित्सक से पूछा, “बताओ, एड़ी में कितनी हड्डियाँ होती हैं?” इस पर वह कनिष्ठ चिकित्सक उत्तर नहीं दे सका, जबकि वरिष्ठ चिकित्सकों की अनुपस्थिति में ऐसे ही नौसिखिये डॉक्टर रोगी का उपचार किया करते हैं।
अब अगली बार से गुप्त कैमरे के साथ अपनी अन्वेषणात्मक पत्रकारिता को धार दूँगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १० दिसम्बर, २०१७ ई०)