
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
ऐसे निकृष्ट लोग, जो हर तरह की कुव्यवस्था के साथ गलबहियाँ करते हैं, जब साहित्य की किसी भी विधा में अथवा विमर्श-वाचन-व्याख्यान अथवा किसी भी प्रकार के लेखन के माध्यम से किसी भी व्यवस्थागत विद्रूपता की बात करते हैं तब उनके गर्हित चरित्र को समझ कर, रक्त उबलने लगता है। कथित कुत्सित व्यवस्था को जन्म देने और उनका बहुविध लालन-पालन करनेवाले ऐसे ही ‘कापुरुष’, ‘नपुंसक’, ‘पुरुषार्थविहीन’, ‘अयोग्य’, ‘पामर’ इत्यादिक लोग ही होते हैं।
जन-जीवन से सम्बन्धित सारी स्वस्थ गतिविधियों को उपर्युक्त कोटि के अवसरवादी लोग थाम लेते हैं और उनके साथ स्वेच्छाचारिता का व्यवहार कर, अपनी अपरिपक्वता का परिचय देते हैं और सुयोग्य प्रतिभाओं के स्थान का अधिग्रहण कर, स्वयं को थोप देते हैं।
ऐसे आत्म-केन्द्रित लोग इस धरती का भार अहर्निश बढ़ाते जा रहे हैं। हाँ, निकृष्ट और दोहरा जीवन जीनेवाले ऐसे लोग का ‘अस्तित्व’ सदैव विचलन की स्थिति में बना रहता है। खुले रूप में ऐसे कुपात्रों का बहिष्कार करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ६ अगस्त, २०१८ ईसवी)