सुख, सुरक्षा, सम्मान और उत्थान क्या है

सुख पाने के लिए इसे जरूर पढ़ें और आगे सभी को फॉरवर्ड भी करें…..!

सारी दुनिया के लिए उलझा हुआ प्रश्न-
सुख, सुरक्षा, सम्मान और उत्थान क्या हैं और कैसे प्राप्त हो सकता है, कृपया स्पष्ट करें?

उत्तर-
मानवजीवन की सारी समस्या ही सुख, सुरक्षा, सम्मान की खोज से उत्पन्न हुई है।

कल्याण या उत्थान की जरुरत भी इन्ही तीनों समस्याओं की देन है।
देखिये…

सभी मनुष्य सुख की खोज में ही दुःखी हैं।
यदि दुःखी न हों तो सुख क्यों खोजेंगे…?
दुःख की अनुभूति ही सुख की खोज का मूल कारण है।

यदि कोई स्थायी सुखानुभूति को प्राप्त हो जाए तो उसकी सुख की खोज स्वतः समाप्त हो जायेगी।

सुख पाने की दौड़ पूरी दुनिया में मची हुई है।
सबको सुख पाने की बेचैनी है।
दुःख को दूर से दूर करने के सैकड़ो हज़ारों उपाय खोजे जा रहे हैं, लेकिन सुख है कि मिलते मिलते ही छूट सा जाता है।

पकड़ते-पकड़ते यह सुख हाथ से फिसल सा जाता है।
बहुत ही चिकना है।
बहुत ही सूक्ष्म है यह सुख।
कितना भी संभालो निकल ही भागता है पिंजरे से यह सुख।

तो फिर लोग इस सुख को कैसे पाएं…?
बड़ी गंभीर समस्या है मनुष्य के सामने।
8 अरब लोग सुख खोज रहे हैं पृथ्वी पर।

हर वस्तु में सुख टटोल लिया लोगों ने।
कभी कभी तो कुछ लगता भी है कि शायद कुछ सुख मिल गया।

लेकिन अगले ही पल हाथ खाली…
लेकिन हाथ में है केवल दुःख भय दैन्य।

फिर वही उदासी, निराशा, हताशा और दुःख आ पहुचता है।
कभी-कभी लोग थक जाते हैं, हार जाते हैं।
सब प्रकार के सुख के साधनो को छोड़कर भाग जाते हैं।

साधू हो जाते हैं।
वैरागी हो जाते हैं।
अब लोग कितना सुख खोजें…

थक हारकर हरिनाम जपने लगते हैं।
“हारे को हरिनाम” सुना ही होगा आपने।

लेकिन तब भी न दुःख मिटता है और न सुख की प्यास ख़त्म होती है…!

तो बाकी दोनों सुरक्षा और सम्मान की प्यास का कहना ही क्या…?
सुख ने ही सबको भारी संकट में डाल रखा है।

दुःखी लोग सुख खोज रहे हैं।
भयभीत लोग सुरक्षा खोज रहे हैं।
दीन-हीन-अपमानित लोग सम्मान खोज रहे हैं।

इन तीनो खोज में इतना समय चट जाता है कि मानव को अपने जीवन विकास के लिए समय ही नहीं बचता।

और इन्ही तीनो की खोज में मनुष्य का उत्थान या विकास खोया हुआ है।
दुनिया का बहुत अहित किया है उन्होंने।
वास्तव में ये सम्मान और सुरक्षा और सुख और उद्धार इत्यादि आपके जीवनविकास के फल है।

मानव जीवनविकास चार आयामी है।
इन चारों आयामों के विकास से ही क्रमशः मनुष्य को सम्मान, सुरक्षा, सुख एवं शान्ति प्राप्त होती है..

PQ – Physical Quotient (शारीरिक क्षमता) कर्मसामर्थ्य विकसित होने पर सम्मान तृप्त होता है।

IQ – Intellectual Quotient (मानसिक क्षमता) ज्ञानसामर्थ्य विकसित होने पर भय मिट जाता है, सुरक्षा तृप्त होती है।

EQ – Emotional Quotient (भावनात्मक क्षमता) के रूप में प्रेमसामर्थ्य विकसित होने पर सुख तृप्त होता है।

SQ- Spiritual Quotient (चेतनात्मक क्षमता) के रूप में विवेकसामर्थ्य विकसित होने पर स्वतः उत्थान या उद्धार या स्वास्थ्य या मोक्ष सिद्ध हो जाता है।

आइये अब इसे व्यापक रूप से समझें…
PQ ही क्रियाशक्ति है जिससे कर्मठता प्राप्त होती है मूल्यवत्ता बढ़ती है।

IQ ही बोधशक्ति है, जिससे अद्वैत सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है और भय मिट जाता है।
द्वैतबोध से ही भय उत्पन्न होता है।
वेदवाक्य है- “द्वितीयाद् वै भयं भवति।”

EQ ही भावशक्ति है जिससे प्रेम जागता है जो सुख है आनंद है मस्ती है मादकता है और इससे दुःख मिट जाता है।

SQ ही विवेकशक्ति है, जो इन तीनों (PQ, IQ, EQ) के विकास का ही फल है।
जो सुखी हो गया है, वह स्वस्थ हो ही जाता है। सुख ही शांति और स्वस्ति का आधार है।
दुःखी व्यक्ति न शांत रह सकता है, न स्वस्थ।

ऊपरोक्त उत्तर से लोग इसके रहस्य को समझ गए होंगे।
स्वजीवनविकास ही स्वास्थ्य की प्राप्ति का उपाय है।

दूसरा प्रश्न-
क्या सुख को खोजने के स्थान पर भावनात्मक विकास के उपाय किये जाने चाहिये…?

उत्तर-
100% उचित यही है।
भावनात्मक विकास के बिना सुख की स्थिर दशा प्राप्त नहीं होगी।

प्रेम ही सुख है।
घृणा से भरे होने पर मिठाई में भी सुख नहीं अनुभव होता।
प्रेमपूर्ण व्यक्ति को प्रत्येक वस्तु में सुख अनुभव होने लगता है।
प्रेमविहीन व्यक्ति सर्वत्र दु:खी रहता है।
चाहे जितने भी सुखभोग के साधन और अवसर उसे सुलभ हों, उसके दु:खों का कोई अंत नहीं।

प्रेम से ही प्राण ऊर्जा सक्रिय होती है।
ऊर्जा की सक्रियता ही सुख है, आनंद है, मस्ती है, मादकता है।

प्रेमविहीन को सुख कहाँ…?
EQ ही प्रेम है।
EQ ही सुख है।
EQ विकसित होने पर व्यक्ति स्वतः सुखी हो जाता है।

सुख के रहस्य को समझें…!
PQ वाले लोग क्रिया के द्वारा प्राण ऊर्जा को झंकृत करके सुख पाने की चेष्टा करते रहते हैं। किंतु यह क्रियात्मक सुख क्षणिक होता है, फिसल जाता है।
सुखोत्सर्जक क्रिया के रुकते ही सुख गायब हो जाता है, सुखानुभूति समाप्त हो जाती है।

IQ वाले लोग कल्पना के द्वारा विषयों में चिंतन द्वारा प्राण को झंकृत करके सुख पाने की चेष्टा करते रहते हैं।
किन्तु यह वैचारिक सुख भी क्षणिक सिद्ध होता है कल्पना रुकते ही सुखद स्वप्न टूट जाता है।

वास्तव में EQ ही सुख का द्वार खोलता है।
प्राण की सहज सक्रियता ही EQ है।
संवेनशीलता ही EQ है।
संबंधों की अनुभूति ही EQ है।
सुर लय तालमेल की तीव्र अनुभूति ही आनंद है, सुख है।
यह सुखानुभूति ही EQ है।
आनंदानुभूति ही EQ है।
संवेदनशील आनंदमयी तरंगों का उभार ही प्रेम है।

संवेदना ही प्रेम है।
प्रेम ही EQ है।
प्रेम ही सुख है।
सुख ही EQ है।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)