देश के विपक्षी राजनीतिक दलों का दोगलापन और सत्तापक्ष की गलबँहिया!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


एक ऐसा विधेयक लोकसभा में पारित करा दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि वर्ष १९७६ से अब तक राजनीतिक दलों के द्वारा लिये गये चन्दे का हिसाब नहीं देना होगा, जबकि अन्य विषयों पर विपक्ष सदनसत्र को चलने नहीं दे रहा है। इससे ज़ाहिर होता है कि सत्तापक्ष और विपक्षी दल आपसी हित को साधने के लिए एक हो जाते हैं और मात्र सत्ता का अधिग्रहण करने के लिए अलग-अलग राग अलापते देखे जाते हैं। ऐसे में, संविधान में संशोधन करते हुए, भारतीय राजनीतिक दलों के अध्याय में जनहित में परिवर्त्तन अपेक्षित हो जाता है। यहाँ निस्सन्देह “चोर-चोर मौसेरे भाई”, “एक ही थैली के चट्टे-बट्टे”, “अन्धी पीसे कुत्ते खायँ” आदिक कहावतें-मुहावरे अपना सार्थक रूप ग्रहण करते हैं।
वर्तमान संसद्-सत्र को विपक्षी दल चलने नहीं दे रहा है और बिना किसी सार्थक भागीदारी के देश के सारे सांसद अवैध रूप में भत्ता आदिक के रूप में मोटी धनराशि लेकर किनारे हो जाते हैं और यह नौटंकी चलती रहती है।
उल्लेखनीय है कि यू०पी०ए० गठबन्धन-शासित सरकार में एन०डी०ए० के सांसद बेहद घृणित नौटंकी करते थे और अब उन्हीं से प्रेरणा पाकर और अपने लोकहित-विरुद्ध नीतियों का विस्तार कर यू०पी०ए० और अन्य क्षेत्रीय दल के विपक्षी सांसद अपनी नितान्त निन्दनीय असंवैधानिक चरित्र और आचरण का परिचय दे रहे हैं और भारतीय गणतन्त्र के शीर्षस्थ पद पर आसीन राष्ट्रपति स्वत: संज्ञान लेकर कोई आदेश-निर्देश करने में असमर्थ जान पड़ते हैं।
ऐसे में, आपसी रार से अलग होकर देश की जनता प्रत्येक स्तर पर अपनी आवाज़ बुलन्द करे, अन्यथा इसी तरह से ‘लोकतन्त्र’ बार-बार पराजित होता रहेगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २० मार्च, २०१८ ई०)