प्रश्न-
शिक्षा और दीक्षा मे अंतर समझाते हुए उनकी दार्शनिक अनिवार्यता पर प्रकाश डालकर जिज्ञासा शांत करने की कृपा करें।
उत्तर-
मनुष्यों में सत्ज्ञान और सत्गुण के विकास हेतु शिक्षा और प्रशिक्षण की जरूरत होती है।
शिक्षा अधिकार की अभिव्यक्ति के लिए है।
किन्तु कर्तव्यबोध के लिए दीक्षा की आवश्यकता है।
दीक्षा एक प्रकार का व्रत है।
सनातन धर्म में इसी दार्शनिक दृष्टिकोण से कर्तव्यबोध की स्थापना के लिए चार प्रकार की कर्मदीक्षाएं प्रशस्त हैं।
- विद्यार्थी दीक्षा
- गृहस्थ दीक्षा
- पुरोहित दीक्षा
- परिव्राजक दीक्षा
इन चार प्रकार की दीक्षाओं से चार श्रमनिष्ठाओं का जागरण होता है।
इसे ही कर्तव्यबोध कहते हैं।
ये चार श्रमनिष्ठायें ही आश्रम व्यवस्था के नाम से जानी जाती हैं।
प्रथम वर्ष में ही विद्यार्थी दीक्षा प्रशस्त है।
25 वर्ष के पश्चात् गृहस्थ दीक्षा प्रशस्त है।
50 वर्ष के पश्चात् पुरोहित दीक्षा प्रशस्त है।
75 वर्ष के पश्चात् परिव्राजक दीक्षा प्रशस्त है। जिसे सन्यास दीक्षा भी कहते है। इसे पुनर्भव दीक्षा भी कहते हैं।
इन चारों दीक्षाओं से ही चार आश्रमों में क्रमशः प्रवेश प्रशस्त है।
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।
इन चारों दीक्षाओं के लिए ही चार संस्कार प्रशस्त हैं।
1.विद्यारम्भ संस्कार
- विवाह संस्कार
- उपनयन संस्कार
- अंत्येष्टि संस्कार
चार प्रकार के संस्कारिक अनुष्ठान द्वारा ही क्रमशः चार प्रकार की दीक्षाएं प्रदान की जाती हैं।
किन्तु यह सैद्धांतिक सत्धर्म हुआ।
हिन्दू धर्म या अन्य किसी भी धर्म में यह सनातन व्यवस्था लुप्त हो चुकी है।
जिससे लोगों के सभी न्यायोचित अधिकार और कर्तव्य नष्ट हो चुके हैं और अधिकाँश मनुष्य दुःख भोग रहे है।
सम्पूर्ण वर्णाश्रम व्यवस्था ही नष्ट कर दी गयी है मूर्खों और धूर्तों द्वारा।
वर्णव्यवस्था को उन्होंने जातिव्यवस्था में बदल दिया है।
और आश्रमव्यवस्था को विश्रामव्यवस्था में बदल दिया है।
सब कुछ उलट दिया गया है।
अब इस पूरी समाजिक और राष्ट्रिय व्यवस्था को इसके शुद्ध दार्शनिक और सत्सैद्धांतिक रूप में पुनर्प्रतिष्ठित किया जाना अनिवार्य हो चुका है।
आप सभी लोग धीरे-धीरे ही सही हिंदुत्व की बीमारी से मुक्त होकर अपने चिर पुरातन शाश्वत और सनातन धर्म की ओर अवश्य लौटेंगे।
क्योंकि यह व्यवस्था “सत्य-प्रेम-न्याय-पुण्य” के चार आयामी दार्शनिक सत्सिद्धांत पर आधारित है।
धर्म के वास्तविक स्वरूप को जानकर आप लोग न डरना न घबराना और न उदास होना और न ही चिड़चिड़ाना।
क्योंकि बहुत दिनों बाद ‘सत्य’ पुनः धरती पर वापस लौटा है।
यदि आज जो हैं वही सनातनी हैं तो धिक्कार है आप लोगों पर।
सत्य से भागे हुए लोग कहीं भी सम्माननीय नहीं हो सकते।
आज तो सभी धर्म पूर्णतः सत्य से प्रेम से न्याय से भागे हुए हैं।
बहुत संशोधन परिवर्तन की आवश्यकता है।
संत और संन्यासी में क्या अंतर है??
जो संतुलित हो गया है उसे संत कहते हैं।
और
जिसने संन्यासदीक्षा ग्रहण किया है उसे सन्यासी कहते हैं।
✍️???????? (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)