फ़िल्म “द केरला स्टोरी” का मोरल मैसेज युवा होते बच्चों के लिए बहुत मायने रखता है

फ़िल्म “द केरला स्टोरी” का मोरल मैसेज युवा होते बच्चों के लिए बहुत मायने रखता है। सच कहूं तो इस फ़िल्म को स्कूल कॉलेज के लिए स्पेशल दिखाए जाने की ज़रूरत है। साथ ही सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए समझाए जाने की ज़रूरत है।

मैंने पूरे परिवार के साथ फ़िल्म देखी…. मेरा नज़रिया किसी फिल्म के लिए सिर्फ एक कहानी समझने का नहीं होता बल्कि अपने समय की फ़िल्म प्रोडक्शन की विद्यार्थी होने के नाते उसके सामाजिक प्रभाव और तकनीकी पक्ष पर भी होता है।

सच कहूं तो इस फ़िल्म को देखकर मन में एक नफ़रत ज़रूर पैदा होगी आतंकी संगठनों की उस रणनीति पर जिसमें बड़ी मोहब्बत से, बड़े सलीके से ,बड़े ही व्यवस्थित ढंग से लड़कियों को प्रेमपाश में इस क़दर उलझाया गया कि वहां से निकलना नामुमकिन सा है। क्योंकि ह्यूमन साइकोलॉजी के दायरे में सभी पैंतरे खेलते दिखे आतंकी गतिविधियों से जुड़े सभी लोग।

ज़्यादातर स्त्रियां भावनात्मक पहलू से देखें तो पुरुष की तुलना में प्रेम, दया,करुणा,ममता जैसे प्राकृतिक गुणों से भरपूर होती हैं इसलिए अक्सर उन्हें कमज़ोर करने के लिए इसी पक्ष पर प्रहार किया जाता है। इस पक्ष पर सोचने की ज़रूरत है कि हमारे घर में बेटियों की परवरिश मोहब्बत के साथ और संस्कारों में सख़्त मिजाज़ घोलने की ज़रुरत है ताकि उनकी चेतना जागृत रहे।

फ़िल्म देखकर मन में उठती नफ़रत क्या सिर्फ आतंकी संगठनों के लोगों के लिए हैं या फिर पूरे वर्ग विशेष के लिए; ये प्रश्न भी उठता है! तो यक़ीनन जवाब हां में होने की संभावना अधिक मिलेगी क्योंकि फ़िल्म की कहानी में एक सशक्त क़िरदार आसिफ़ा का है जो संगठन से जुड़ी है। वो स्वयं एक लड़की है, समझदार है; अच्छी दोस्त होने की हर सम्भावना को पैदा करने के सभी गुणों के साथ दोस्ती और स्त्री होने के सभी प्रतिमानों को कलंकित करती है। लेकिन हर तरह सुरक्षित है… न उसका कोई प्रेमी, न उसका बलात्कार,न उससे कोई छेड़छाड़….एक संगठन या वर्ग विशेष का अपने और गैर समुदाय की स्त्री से ये भेद क्यों रहता है सदैव ये भी प्रश्न है? चूंकि ये क़िरदार आम लोगों के बीच एक दोस्त बनकर आम लोगों के जैसा ही है तो यकीनन संगठन के अलावा आम जनमानस में हमारे बीच के हर वर्ग विशेष के प्रति नफ़रत होना स्वाभाविक और पहली प्रतिक्रिया होगी।

फ़िल्म देखकर निकलते वक़्त ये मंथन करते हुए निकलने की स्थिति होती है कि भारत की संस्कृति मे जहां हर धर्म के लोग हैं और संविधान में सबको समान देखने के संकल्प से बंधे देश के नागरिक की भूमिका में हम कैसे न्यायसंगत व्यवहार करेंगे …. तो यक़ीन मानिए ये सबसे बड़ी चुनौती है भारत देश के हर व्यक्ति की मनःस्थिति की।

मेरी नज़र में समाधान ये कि हमें हमारी संस्कृति, संस्कार, शिक्षा में जड़ों की ओर लौटना होगा। अपने कर्तव्यों को, (चाहे वो देश के प्रति हों या फिर समाज और परिवार के प्रति) इन सबकी प्राथमिकता के आधार पर समझना होगा। अपने धर्म में अटूट विश्वास और कट्टरता के सही मायने समझने होंगे । व्यवहारिक पक्ष में हमें अपनी धर्म, संस्कृति के नियम वचन के साथ अडिग होने की ज़रूरत है कट्टर नहीं क्योंकि हमारी अडिगता ही हमारी संस्कृति की पहचान है कट्टरता नहीं। कट्टर होकर लोग अपने भीतर मानवीय मूल्यों का संहार करके सिर्फ अपना हित साधते हैं।

दोस्ती हो या प्रेम सहज ही नहीं स्वीकारना चाहिए क्योंकि ये दोनों भाव यदि ईमानदारी से जिये जाएं तो दिखने में जितने सहज होते हैं निभाने में उतने ही जटिल।

ये फ़िल्म मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और सिनेमाई पक्ष में सशक्त फ़िल्म है जो सफल है अपने मानकों पर। इसलिए सिर्फ लड़कियों ही नहीं लड़कों को भी देखनी चाहिए।
लड़के भी इसी उम्र में दिग्भ्रमित किये जाते हैं बस एंगल बदल जाते हैं….

फ़िल्म को लेकर सहज ही जो भाव जन्म लेते हैं हर किसी के मन में उस पर ही सारा विमर्श टिका है…. आवेशित नहीं आत्ममंथन की ज़रूरत है, नफ़रत नहीं चेतना के जागृत होने की ज़रुरत है।

वसुधैव कुटुम्बकम के भाव के साथ विस्तृत चर्चा फिर कभी आमने-सामने होती रहेंगीं।

शालिनी सिंह (रेडियो जॉकी)
मैनेजिंग डायरेक्टर, रेडियो जंक्शन