क़लम को हथियार बनाकर अँगरेजोँ की नीद उड़ा ले गये, गणेशशंकर विद्यार्थी!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

◆ गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान-दिनांक (२५ मार्च) के अवसर पर विशेष प्रस्तुति

गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऐसा नाम है, जिनके व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व (‘कृतित्व’ अशुद्ध शब्द है।) मे तीन प्रकार गुण विद्यमान थे :– प्रथम, पत्रकार द्वितीय, स्वाधीनता-सेनानी और तृतीय, राजनेता।

ऐसे गुणवान् क्रान्तिकारिक हस्ताक्षर ने २६ अक्तूबर, १८९० ईसवी को अतरसुइया, इलाहाबाद (वर्तमान मे प्रयागराज), संयुक्त प्रान्त (अब उत्तरप्रदेश) मे अपने ननिहाल मे जन्म लेकर क्रान्तिधर्मिणी धरती को धन्य किया था। वह घर आज भी अतरसुइया, प्रयागराज मे दुर्गापूजा-पार्क के समीप ९५७/४९३/३६८ निवास-संख्या के रूप मे स्थित है। उनकी माता गोमती देवी थीँ, जो एक गृहिणी थीँ और पिता जयनारायण श्रीवास्तव फतेहपुर (उत्तरप्रदेश) के हथगाँव नामक गाँव मे निवास करते थे। पिता जयनारायण श्रीवास्तव सहारनपुर मे सहायक कारागार-अधिकारी थे, तब गणेशशंकर श्रीवास्तव की अवस्था लगभग तीन वर्ष की थी। उनके पिता कालान्तर मे, ग्वालियर-रियासत के अन्तर्गत मुंगावली मे बस गये थे, जहाँ वे एंग्लो वर्नाक्यूलर स्कूल मे प्रधानाध्यापक-पद पर प्रतिष्ठित थे। वहीँ गणेशशंकर श्रीवास्तव की प्राथमिक शिक्षा उर्दू से प्रारम्भ हुई थी, फिर मिडिल मे हिन्दी और अँगरेज़ी-विषय जुड़ गये। जहाँ से वे १९०५ ई० मे मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

गणेशशंकर श्रीवास्तव आरम्भ से ही लेखन के प्रति समर्पित थे, जिसका परिणाम था, उनकी बाल्यावस्था मे ही लेखन-बीज ने अंकुरण का श्रेय प्राप्त कर लिया था। यही कारण था कि उन्होँने मिडिल स्कूल मे अध्ययन करते ही समय ‘हमारी आत्मोत्सर्गता’ नामक एक कृति का प्रणयन कर दिया था, जिसने आगे चलकर पुस्तक का आकार ग्रहण कर लिया था। उस पुस्तक मे भारतीय जन के त्याग और बलिदान की गाथा लिखी गयी थी।

गणेशशंकर के पिता चाहते थे कि उनका बेटा कहीँ नौकरी कर ले; इस उद्देश्य से उन्होँने गणेशशंकर को कानपुर मे रहनेवाले अपने बड़े बेटे शिवव्रत नारायण को सौँप दिया था। शिवव्रत आर्यसमाज के कार्य मे लगे थे। शिवव्रत अपने अनुज गणेशशंकर की प्रतिभा से सुपरिचित थे। उन्होँने गणेश के लिए आर्यसमाज की पत्र-पत्रिकाएँ उपलब्ध करायीँ, जिन्हेँ गणेश चाव के साथ पढ़ते और ज्ञानवर्द्धन करते थे। अग्रज शिवव्रत चाहते थे कि उनका भाई अभी अध्ययन करे– इस दृष्टि से उन्होँने एण्ट्रेंस की पाठ्यपुस्तकेँ क्रय करके गणेश को दिया और उन्हेँ आगे के अध्ययन के लिए पिता के पास भेज दिया।

गणेशशंकर भी चाहते थे कि वे अपना अध्ययनक्रम बनाये रखेँ, जिसकी पूर्ति के लिए उन्होँने व्यक्तिगत रूप मे तैयारी कर परीक्षा दी थी। उन्होँने फ़ारसी, अँगरेज़ी, गणित और इतिहास-विषयोँ मे द्वितीय श्रेणी मे एण्ट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उन दिनो इलाहाबाद मे अध्ययन-अध्यापन का वातावरण सुखद था, इसलिए गणेशशंकर श्रीवास्तव को १९०७ ईसवी मे एफ० ए० मे अध्ययन के लिए कायस्थ पाठशाला मे प्रवेश कराया गया था। अध्ययन-काल की अवधि मे उनकी आँखेँ विकृत हो गयीँ, जिसके कारण उनका अध्ययन संकटग्रस्त हो गया; फलत: उन्हेँ अपने भाई शिवव्रत के पास जाना पड़ा। भाई ने वहाँ उनकी तीस रुपये के मासिक वेतन पर करेंसी-कार्यालय मे नौकरी लगवा दी थी। वहाँ भी उनका अध्ययन और लेखन जारी रहा। वे अँगरेज़ी राज की ओर से भारतीयोँ पर की जा रही प्रताड़ना के विरुद्ध लेख लिखने और भारतीय समाज को जाग्रत् करने से चूकते नहीँ थे। अँगरेज़ अधिकारियोँ की आँखोँ मे उनके लेख काँटोँ की तरह से चुभते रहे; फलत: उन्हेँ नौकरी छोड़नी पड़ी थी। वे कानपुर के ही पृथ्वीनाथ हाई स्कूल मे अध्यापन करने लगे। वह स्कूल उनके मनोनुकूल था। वहाँ रहकर उनका पठन-पाठन और लेखन निर्बाध गति मे चलता रहा। उन्हेँ पण्डित सुन्दरलाल-द्वारा सम्पादित हिन्दी-साप्ताहिक समाचारपत्र ‘कर्मयोगी’ की विषयवस्तु अत्यन्त रास आती थी, इसलिए वे उसे नियमित रूप से अवकाश के पल मे उसे पढ़ा करते थे। इतना ही नहीँ, वे ‘स्वराज्य’ (उर्दू), ‘सरस्वती’ और ‘हितवार्त्ता’ मे यथावसर लेखन भी करते थे। चूँकि गणेशशंकर स्वाभिमानी थे अत: वे एक जगह स्थायी रूप से लगकर सेवाकार्य कर नहीँ पाते थे।

उनके लिए कानपुर से अत्युत्तम वातावरण इलाहाबाद का था। वहाँ का साहित्यिक परिवेश उनके अनुकूल था। वहाँ उन्होँने पण्डित सुन्दरलाल का सान्निध्य ग्रहण किया था। वे उर्दू-समाचारपत्र ‘स्वराज्य’ मे अरबी-फ़ारसी मे लिखते थे; परन्तु ‘भारत मे अँगरेज़ी राज’ के प्रतिष्ठित लेखक सुन्दरलाल की प्रेरणा से हिन्दी मे लेखन करने लगे। सुन्दरलाल ने गणेशशंकर श्रीवास्तव की प्रतिभा भाँप ली थी। उन्होँने गणेश को अपने हिन्दी-साप्ताहिक ‘कर्मयोगी’ मे सम्पादन-सहयोगी के रूप मे लेखन-सम्पादन करने का दायित्व सौँप दिया था। उन्हीँ की प्रेरणा से वे गणेशशंकर श्रीवास्तव के स्थान पर ‘गणेशशंकर विद्यार्थी’ के नाम से लेखन-सम्पादन करने लगे थे। कालान्तर मे, उन्होँने इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद से मुद्रित और प्रकाशित हिन्दी-मासिकी ‘सरस्वती’ के सम्पादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का सान्निध्य ग्रहण किया था। वहाँ आचार्य द्विवेदी ने विद्यार्थी को अपना सहायक बनाकर, उनके अन्तस् मे पत्रकारिता का बीजवपन किया था, ‘पण्डित सुन्दरलाल’ और साहित्य का ‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी’ ने। विद्यार्थी दोनो ही की अपने सुयोग्य गुरु के रूप मे प्रतिष्ठा करते थे। उनकी अभिरुचि स्वाधीनता-आन्दोलन और राजनीति के प्रति थी, जबकि ‘सरस्वती’ पत्रिका साहित्यिक थी। उन्हेँ ‘सरस्वती’ से अलग होना पड़ा और ‘अभ्युदय’ के साथ जुड़ना पड़ा। वहाँ वे चालीस रुपये के मासिक वेतन पर सहायक सम्पादक की भूमिका मे बने रहे।

उन्होँने उन्मुक्त पत्रकारीय धर्म का निर्वहण करने के लिए स्वयं एक ऐसे हिन्दी-समाचारपत्र का मुद्रण करने का ठोस विचार किया, जिसके माध्यम से राष्ट्रहित मे उन्मुक्त विचार का प्रचारण-प्रसारण होता रहे; फिर क्या था, उन्होँने ९ नवम्बर, १९१३ ईसवी को कानपुर से एक ऐसे साप्ताहिक समाचारपत्र का सम्पादन किया था, जिसके ‘प्रताप’ को पराधीन भारत मे शासन कर रही अँगरेज़ी हुक़ूमत सहन नहीँ कर पा रही थी। उस साप्ताहिक हिन्दी-समाचारपत्र का नाम भी ‘प्रताप’ था। उसमे वंचित, शोषित और पीड़ितजन की व्यथा-कथा और अँगरेज़ीराज की अमानवीयता का विवरण प्रकाशित होता था। वह समाचारपत्र स्वाधीनता-आन्दोलन के प्रवक्ता के रूप मे अपना क्रान्तिकारिक योगदान करता रहा। उस समय उनकी अवस्था मात्र तेईस वर्ष की थी। सात वर्ष के पश्चात् १९२० ईसवी मे ‘प्रताप’ साप्ताहिक से दैनिक का रूप ले चुका था। उन्होँने उसी अवधि मे एक ऐसी मासिक पत्रिका सम्पादित की थी, जिसमे साहित्य के साथ राजनीति का भी स्वर सुनायी दे; उसका नामकरण ‘प्रभा’ किया गया था।

गणेशशंकर विद्यार्थी ‘प्रताप’ के सम्पादक और लेखक के रूप मे अँगरेज़ी राज की प्रताड़ना और दूषित शासन-व्यवस्था के विरुद्ध अपने लेखोँ के माध्यम से आग उगलते रहे; परिणामत: उन्हेँ पाँच बार कारावास का दण्ड भुगतना पड़ा था। उन्हेँ राजनीतिक जीवन मे लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और महात्मा गांधी का सान्निध्य प्राप्त हुआ था। एनी बेसेण्ट के ‘होम रुल’ आन्दोलन मे उनकी सक्रिय भूमिका देखते ही बनती थी। उन्हेँ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की राष्ट्रवादिता भा गयी थी, जिसके कारण वे उसके द्वारा आयोजित अनेक आन्दोलनो मे अपना महत् योगदान करते रहे। वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस मे संयुक्त प्रान्त (वर्तमान मे उत्तरप्रदेश) के शीर्षस्थ नेता बनाये गये थे। उन्हेँ १९२५ ईसवी मे कानपुर मे आयोजित भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन के स्वागत-समिति का प्रधानमन्त्री मनोनीत किया गया था। वे १९३० ई० मे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रान्तीय अध्यक्ष निर्वाचित किये गये थे। उनके उग्र, क्रोधी और हठी स्वभाव को देखते हुए, उन्हेँ सत्याग्रह-आन्दोलन के लिए प्रदेश का प्रथम ‘डिक्टेटर’ बनाया गया था। वे एक कुशल वक्ता थे। वे विकृत व्यवस्था को सुकृत करने के पक्षधर थे। उनकी ईश्वरीय शक्ति के प्रति अत्यन्त आस्था थी।

इतना सब होने के बाद भी उनके भीतर जो सबसे महत्त्व का गुण था, वह था, उनका लेखकीय व्यक्तित्व। गणेशशंकर विद्यार्थी ने पण्डित जवाहरलाल नेहरू की भाँति ही अपने कारागार मे व्यतीत की गयी अवधि को रचनात्मक रूप दिया था। उन्होँने अपने कारागार-जीवन मे विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासोँ :– ‘लॉ मिजरेबिल्स’ और ‘नाइण्टी थ्री’ का हिन्दीभाषा मे भावानुवाद किया था; परन्तु उनका मुद्रण नहीँ हो पाया था।

वे साम्प्रदायिक सद्भाव के पक्षधर थे। उनका चिन्तन सम्प्रदाय, जाति, वर्ग, पन्थादिक से परे का विषय था। वे कानपुर मे भड़के एक साम्प्रदायिक दंगे मे हताहतोँ की सहायता और उन्मादी भीड़ को समझाने के लिए सामने आ गये थे; परन्तु उसी दौरान उन्हेँ अज्ञात उपद्रवी भीड़ ने घेरकर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। वह काली तारीख़ थी, २५ मार्च, १९३१ ईसवी की।

उनके निधन पर उनकी पुत्री विमला विद्यार्थी ने बताया था, “मै हत्यारोँ को दंगाई नहीँ, बल्कि औपनिवेशिक शासकोँ-द्वारा निर्देशित व्यक्ति मानती हूँ। मुझे एक जानकार ने बताया था कि कई इलाक़ोँ मे हथियार बाँटे जा रहे थे और कहा जा रहा था कि कानपुर का शेर (गणेशशंकर विद्यार्थी) उसी दिन मारा जायेगा। विमला का मानना था, “विद्यार्थी की हत्या उसी षडयन्त्र का हिस्सा था, जिसके कारण भगत सिँह, सुखदेव और राजगुरु को जल्दबाज़ी मे फाँसी दी गयी थी।”

गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान को लेकर महात्मा गांधी ने कहा था, “विद्यार्थी जी की मृत्यु एक ऐसे महान् उद्देव्य के लिए हुई है कि ऐसी मृत्यु से उन्हेँ ईर्ष्या होती है। ऐसी मौत तो बहुत फ़क्र की बात है और काश! मुझे भी वैसी ही मौत मिले।”

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