
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’-
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे …
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला…
आज भारत के अमर सपूत और हम युवाओं के साक्षात ईश्वर भगत सिंह का जन्म दिवस है । हालांकि भगत सिंह का जन्म दिन 27 को भी मनाया जाता है, लेकिन हम सब आज 28 को इस महान क्रान्तिकारी का जन्म दिन मना रहे हैं। भगत की जन्मतिथि मनाने का एक ही मकसद है और वह है हर तरह की दासता से छुटकारा।
आज देश मानसिक दासता के मकड़जाल में उलझ गया है। भगत सिंह की दिखायी राह पर चलकर मानसिक दासता से भी मुक्ति पायी जा सकती है। सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में बम फेंकना भगत की बौद्धिक क्रांति का एक नमूना भर है।
मानसिक और बौद्धिक क्रान्ति की बात हो; अमर शहीद भगत के उपवास को छोड़ दिया जाए तो यह मूर्खता से भी आगे की चीज होगी। जेल में भगत सिंह और उनके साथियों की 64 दिनो की भूख-हड़ताल जैसा कोई और उदाहरण हमे नहीं मिलता। शहीद-ए-आज़म के उपवास ने पूरे ब्रिटेन को हिलाकर रख दिया था। भगत सिंह जेलजीवन के दौरान विश्व के श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ और पण्डित बनकर उभरे। शायद यही कारण था कि परिस्थितियों के उलट उन्हें एक दिन पहले ही शूली पर चढ़ा दिया गया।
भगत सिंह एक ऐसी शख्सियत का नाम है जो शोध के लिए भारत के इतिहास और दर्शन के साथ राजनीतिशास्त्रियों के लिए बड़ा मामला हो सकते हैं। लेकिन देश की मनोदशा देखकर ऐसा लगता है कि महान व्यक्तियों से ज्यादा हमे वह पसन्द हैं जिन्होंने हमे चोट पहुँचाई हो।
खैर बात भगत सिंह की करते हैं… जेल से अन्तिम समय मे भाई कुलतार को लिखे पत्र में वह लिखते हैं कि—
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।
इन पंक्तियों को पढ़ने और समझने के बाद क्रान्ति का नया स्वरूप सामने आता है, जो प्रायः आम इंसान के लिए असम्भव है। जीवट, सहनशीलता, पाण्डित्य का ऐसा संगम किसी भी महान व्यक्ति या देवता मे नहीं मिलता जो भगत मे दिखता है। आज का समय भगत के आदर्शों को समझने का है। यदि ऐसा कर लिया जाये तो देश स्वतः सुधरता चला जायेगा। राजनीति और व्यवस्था झकमारकर सही राह पर आ जायेगी। एक नास्तिक के विचारों से रामराज आ जाएगा। बस भगत को समझने की देर है।
वन्देमातरम्