जगन्नाथ शुक्ल…✍ (प्रयागराज)

बुझे थे दीये जगमगाने लगे हैं।
गाँव सारे शहर में समाने लगे हैं।।
आँगन की सिसकी समझने से पहले;
दहलीज़ घर की गिराने लगे हैं।
पिछले बरस ही तो पैदा हुए थे;
अभी से मोमबत्ती बुझाने लगे हैं।
चाहें न अब वो दुवा भी किसी की;
बड़े हो गये हैं; कमाने लगे हैं।
नये पंख पा उड़ गए थे कभी जो;
परिंदे लौट के घर को आने लगे हैं।
सुने न ‘जगन’ के मासूम दिल की;
टूटन वो ख़ुद की सुनाने लगे हैं।