जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

हर आँख है उनींदी सी आँकते रहो।
अन्धों का शहर है यहाँ जागते रहो।।
आँखों में है मुहब्बत या है नुमाईश,
हर पल निगाहें उनकी भाँपते रहो।
कैसा है दस्तूर और कैसा है ये मंजर,
बेख़ौफ़ निगाहें हैं मगर काँपते रहो।
हर ज़ुबाँ में है प्यास , निगाहों में आस,
मौका भी है मौजूद मगर ताकते रहो।
भरा हुआ गोदाम मगर पेट है खाली,
जल रहीं हैं ज़िन्दगी मगर तापते रहो।
छोड़ी नहीं जमीन मगर रेस है लम्बी,
कौन देखता है यहाँ केवल हाँकते रहो।