जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबादकिट किट करती ठण्ढी आई
सबको याद रजाई आई ।
झर झर झर झर हवा बह रही ,
जगह जगह अलाव जलाई।
ओस की बूँदें हैं मुसकाई,
सर्दी से कलियाँ मुरझाईं।
चारों तरफ है घना कुहासा,
सूरज की किरणें अलसाईं।
स्वेटर, टोपी की याद सताई,
तिल औ गुड़ की बनी मिठाई।
शीतलता ने लम्बी चादर तानी,
चाँद की हैं आँखें भर आईं।
खाँसी जुक़ाम से हुई लड़ाई,
सबको बचकर है रहना भाई।
छोटा दिन और लम्बी रातें,
दाँत से मिलकर करें ढिठाई।