जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

बाग़ किनारे खेत है मेरा,
बाग़ में है खगवृन्दों का डेरा।
विविध रूप और रंग -बिरंगी ,
संग में लातीं अपनी साथी संगी।
तरह-तरह के हैं ये गाना गाती,
हर मन को ये हैं हर्षाती।
ऐसा नहीं यह फसल ही खाते,
शत्रु कीट भी इनसे भय हैं खाते।
हम सब जीव हैं ईश की रचना,
फिर क्यों खग को है हमसे बचना?
चलो हम मानव धर्म निभायें
प्रकृति को न हम दुःख पहुँचायें।