ग़ज़ल- अन्धों का शहर है यहाँ जागते रहो
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद हर आँख है उनींदी सी आँकते रहो। अन्धों का शहर है यहाँ जागते रहो।। आँखों में है मुहब्बत या है नुमाईश, हर पल निगाहें उनकी भाँपते रहो। कैसा है दस्तूर और कैसा […]
जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद हर आँख है उनींदी सी आँकते रहो। अन्धों का शहर है यहाँ जागते रहो।। आँखों में है मुहब्बत या है नुमाईश, हर पल निगाहें उनकी भाँपते रहो। कैसा है दस्तूर और कैसा […]