गज़ल : सिसकियों की गूँज में, हिचकियों को तरसे

जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद)

चौंक  उठता  हूँ  मैं अक़्सर  रातों में;
ज़िस्म तड़पता  मिलता , जज़्बातों में।
मन  में उठता  गुबार परेशां करता;
क्या से क्या हो गये बातों -बातों में?
दिल तो कचोटता होगा तुम्हारा भी;
यूँ बँटकर अलग-अलग औकातों में।
सिसकियों की गूँज में, हिचकियों को तरसे;
आखिर क्या मिला यूँ रह कर दो हातों में?
दिल को हिन्दू , ज़िस्म मुसलमान कर के;
मोहब्बत बदनाम कर डाला सभी नातों में।
शैल का भी मैल कट जाये नयन के जल से;
‘जगन’ छला जाता रहा बनावटी सौगातों में।