
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
देश की जिस सी०बी०आइ० को शीर्षस्थ परीक्षण/जाँच-अभिकरण माना जाता है, राजनीतिक षड़यन्त्र के कारण उसकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा है। इससे सम्पूर्ण विश्व में एक अविश्वसनीय और शोचनीय सन्देश सम्प्रेषित हुआ है। ‘सी०बी०आइ०’ को स्वायत्त किया जाना, अब अपरिहार्य हो गया है। वर्षों से इसकी कार्यशैली को लेकर प्रश्नचिह्न खड़े होते रहे हैं। यू०पी०ए० के शासनकाल में सी०बी०आइ० को ‘तोता’ कहा जाता था और एन०डी०ए० के समय में वह अब ‘गौरय्या’ बन चुकी है। सी०बी०आइ० की कार्यशैली में सरकारें हस्तक्षेप करती आयी हैं। वर्तमान में सत्ताधारियों की ओर से अनावश्यक और असंवैधानिक हस्तक्षेप यदि किया जा रहा है तो उसके अधिकारी न्यायालय में इसे सुस्पष्ट करें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ‘सी०बी०आइ०’ नामक संस्था देश की जनता की हितसंरक्षिका है, न कि सत्ताधारियों की जागीर है।
सी०बी०आइ० में शर्मनाक रिश्वत लेने के आरोप-प्रत्यारोप के कारण विस्फोटक स्थिति हो जाने से, २३ अक्तूबर, २०१८ ईसवी को विलम्ब रात्रि में २ बजे यह समाचार प्रसारित किया गया था– सी०बी०आइ० के निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना से उनके सभी अधिकारों को छीन लिया गया है तथा १३ अधिकारियों का स्थानान्तरण कर दिया गया है। अब जब दो प्रश्न वायुमण्डल में तैरने लगे हैं– क्यों हटाये गये हैं और किसकी शह पर हटाये गये हैं तब सरकार की हवा खिसक गयी है। सरकार-द्वारा हटाने के अधिकार को चुनौती दी गयी है तब सरकार के प्रवक्ता चिल्ला-चिल्लाकर स्पष्टीकरण दे रहे हैं– दोनों को हटाया नहीं गया है, बल्कि छुट्टी पर भेजा गया है।
दूसरी ओर, काँग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप मढ़ा है कि चूँकि आलोक वर्मा ‘राफैल-प्रकरण’ की जाँच करनेवाले थे इसलिए नरेन्द्र मोदी ने आलोक वर्मा को हटा दिया है। ऐसे में, राहुल गांधी से प्रश्न किया जाना चाहिए– राहुल गांधी को यह कैसे ज्ञान हो गया था कि आलोक वर्मा ‘राफैल-प्रकरण’ की जाँच करना चाहते थे। आलोक वर्मा की जब नियुक्ति की जा रही थी तब काँग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी विपक्षी नेता के रूप में चयन-समिति में थे और उन्होंने आलोक वर्मा की नियुक्ति को ग़लत ठहराया गया था और वही आलोक वर्मा के अब पक्षधर बनते दिख रहे हैं? वाह! दोगले चरित्र का जवाब नहीं। यह तथ्य भी सामने आया है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने एक सिरे से अपने लोग को सी०बी०आइ० में भर लिये थे। यदि यह सत्य है तो बहुत ही गम्भीर आपराधिक कृत्य है।
कल (२५ अक्तूबर, २०१८ ईसवी) आलोक वर्मा के आवास/निवास की जासूसी करते सी०बी०आइ० में काम करनेवाले चार लोग पकड़े गये थे और बाद में छोड़ दिये गये। ऐसे में, प्रश्न है– किसके इशारे पर जासूसी करनेवाले चारों सी०बी०आइ० कर्मियों को छोड़ दिया गया था? आलोक वर्मा अपना प्रकरण अब न्यायालय में ले गये हैं। ऐसे में, उन्हें चाहिए कि उन पर अथवा सी०बी०आइ० पर देश के सत्ताधारियों का किसी भी तरह से दबाव है तो उसे निर्भीक होकर सप्रमाण सार्वजनिक करें, जिससे निकट भविष्य में सी०बी०आइ० को स्वायत्तता देने के लिए देश में जनमत-संग्रह की प्रक्रिया को आरम्भ किया जा सके अथवा उस अभिकरण को स्वायत्त कराने के लिए गम्भीरतापूर्वक विचारमन्थन आरम्भ किया जाये।