देश के नेताओ (‘नेताओं, नेताओं! अशुद्ध हैं।)! सुनो

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश मे दो क़ानून :–
एक तुम्हारा और दूजा हमारा।

तुम चाहें जितनी और जितनी बार पेंशन लो और हमारी पेंशन बन्द; तुम चाहें जितनी भी सुविधाएँ लो, हमारी सुविधाओं पर तुषारपात (‘तुषारापात’ अशुद्ध है।)!

चिन्ता मत करो। आज तुम्हारा अधिनायकतन्त्र है; कल हमारा जनतन्त्र होगा। ‘साहित्य’ मे सब दर्ज़ होगा और समय तुम सभी से एक-एक पल का हिसाब मागेगा, फिर ‘पश्चात्ताप’ (‘पश्चाताप’ अशुद्ध है।) और प्रायश्चित्त (‘प्रायश्चित’ अशुद्ध है।) करने के लिए अवकाश तक नहीं मिलेगा। समयशिला पर जब समय-सत्य साहित्यशिल्पी हस्ताक्षर करता है तब उसमे से जिस ‘आह और संवेदना’ की दहकती आग निकलती है, वह अनाचारियों और कदाचारियों को जलाकर राख कर देती है।

भारतेन्दु, प्रेमचन्द, शरच्चन्द्र, यशपाल, फणीश्वरनाथ रेणु, दिनकर आदिक यों ही कालजयी सर्जक नहीं हो गये। तुम्हारे चाटुकार चरणधारक तुम्हारा प्रशस्ति-गायन कर, पुरस्कारराशि और चेक़ तो बटोर सकते हैं; तुम्हारे साहित्यिक-सांस्कृतिक दुकानो मे सौदेबाज़ी तो कर सकते हैं; परन्तु जनसामान्य की श्रद्धा नहीं पा सकते; स्वस्थ लेखनीजीवियों की दृष्टि मे समादर के पात्र नहीं हो सकते और जब वे अपने उधारी आसन से हटते अथवा हटाये जाते हैं तब उन पर ‘थूक’ को भी अपव्यय करने की इच्छा नहीं होती; क्योंकि हमारे विज्ञानियों (यहाँ ‘वैज्ञानिकों’ का प्रयोग अशुद्ध है।) ने सिद्ध कर दिया है कि ‘थूक’ मनुष्य की देह की ‘विटामिन’ है।

अब भी समय है; स्वयं के आचरण और चरित्र मे परिष्कार लाओ और समदर्शी बनो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ जून, २०२२ ईसवी।)