चिन्तन-अनुचिन्तन

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कोई मनुष्य महान् नहीं होता, उसकी ‘मनुष्यता ‘महान् होती है। कोई साधक महान् नहीं होता, उसकी ‘सिद्धि’ महान् होती है। कोई विदुषी अथवा विद्वान् महान् नहीं होता, उसका ‘वैदुष्य’ और उसकी ‘विद्वत्ता’ महान् होती है। उसी प्रकार कोई लेखक महान् नहीं होता, उसकी ‘शब्दधर्मिता’ महान् होती है। कोई साहित्यकार महान् नहीं होता, उसका ‘शिल्पगत संस्कार’ महान् होता है तथा कोई सर्जक महान् नहीं होता है, उसके ‘चिन्तन का धरातल’ महान् होता है, अतः अपने-अपने निर्धारित कर्म के प्रति मनसा-वाचा-कर्मणा सन्नद्ध और सजग रहें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ जुलाई, २०२२ ईसवी।)