डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
प्रेमचन्द-विषयक इस विशेषांक में प्रत्येक स्थान पर ‘प्रेमचन्द्र’ ही छपा है। एक-दो स्थान पर होता तो मुद्रणप्रणाली के प्रक्रियान्तर्गत एक सामान्य भूल मानी जा सकती थी; परन्तु यहाँ तो ‘अज्ञान की सञ्चित राशि’ परिलक्षित हो रही है।
उल्लेखनीय है कि यह समाचारपत्र ‘प्रयागराज’ से प्रकाशित होता आ रहा है। इसे कल मेरे एक शुभचिन्तक ने दिया था, जो सम्पादक महोदय के अति भी निकट हैं; परन्तु खेद का विषय है कि उन महोदय में इतना भी साहस नहीं है कि वे सम्पादक के संज्ञान में इस ‘भयंकर अशुद्धि’ को लाते।
विशेषता यह है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दीविभाग के एक ‘असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर साहिब’ और इलाहाबाद के बोराभर के नामी-गिरामी साहित्यकार, कवि-कवयित्री, शाइर, अध्यापक, प्रवक्ता, असिस्टेण्ट प्रोफेसर आदिक लोग इस समाचारपत्र के सम्पादक और कवि ‘उमेश चन्द्र श्रीवास्तव’ के साथ जुड़े हुए हैं।
अफ़सोस! अपने को हिन्दी के साहित्यकार-समीक्षक, कवि-कवयित्री, अध्यापक, प्रवक्ता, प्राध्यापक आदिक कहनेवाले लोग आँखों पर पट्टी बाँधे हुए हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ अगस्त, २०१९ ईसवी)