आँधी मेँ औँधा पेड़

सुधेश-


पास के बगीचे मेँ
एक बूढा पेड
आँधी मेँ औँधे मुँह पडा था
न माली पास आया न लकडी चोर
धूप मेँ सूखा पानी मेँ गला
यतीम सा पडा रहा कमबख्त
मरने को।
महीनोँ बाद उधर से गुजरा
तो देख आँखेँ चौडाईँ
सूखे भूखे पेड की गाँठोँ मेँ से
हरी डालियाँ खिलीँ
हरे पत्तोँ के हाथ हिल हिल कहते
कितना मारो कितना काटो
हम तो खिलेँगे
हम न मरेँगे ॥