कहानी : पश्चात्ताप


राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी राघव, बालामऊ, हरदोई–

जिला परिषद के छोटे से विद्यालय में राजेन्द्र सर अपनी सादगी, ईमानदारी और शांत स्वभाव के कारण सबके प्रिय थे। वे कम बोलते थे, लेकिन हर शब्द सच्चाई से भरा होता था। उनके लिए पढ़ाना सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक तपस्या थी।

इसी विद्यालय में आकांक्षा, एक चमक-दमक से भरी, आकर्षक व्यक्तित्व वाली शिक्षिका हाल ही में आई थी। चेहरे पर दर्प और व्यवहार में अजीब-सी ऊँचाई—जैसे वह सबकी कमजोरियाँ सूँघ लेना चाहती हो। आकांक्षा की सबसे बड़ी भूल यही थी कि वह हर व्यक्ति को अपनी दूषित सोच के चश्मे से परखती थी।

कुछ ही दिनों में उसे राजेन्द्र सर का शांत स्वभाव खटकने लगा। उसे लगता था कि हर कोई दिखावे, चालाकी या छुपे इरादों से ही व्यवहार करता है। सादगी और पवित्रता उसके लिए असंभव बातें थीं। उसने अपनी सोच के आधार पर राजेन्द्र सर के बारे में भ्रम फैलाना शुरू कर दिया—बातें बढ़ाचढ़ाकर कहना, आधा सच को पूरा झूठ बना देना और फिर उसे ऐसे फैलाना जैसे वही अंतिम सत्य हो।

राजेन्द्र सर इन बातों से परिचित थे; सहकर्मी धीरे-धीरे इशारों में सब बता चुके थे। लेकिन उन्होंने प्रतिक्रिया देने की बजाय मौन को चुन लिया। उन्हें पता था कि कुछ लोग तर्क से नहीं, सिर्फ तमाशे से समझते हैं।

एक दिन स्टाफ रूम में आकांक्षा ने सार्वजनिक रूप से उन पर आरोप लगाया कि वे उसकी बहुत परवाह दिखा कर “करीब आने” की कोशिश करते हैं। यह सुनकर सभी स्तब्ध रह गए—क्योंकि विद्यालय का हर सदस्य राजेन्द्र सर के स्वभाव से परिचित था।

राजेन्द्र सर ने शांत स्वर में कहा—
“आकांक्षा जी, कभी-कभी किसी को अपना समझना भी आपके हिसाब से चरित्रहीनता बन जाता है। यह आपका भ्रम है, हमारी गलती नहीं। अपनी सोच को दूसरों के चरित्र पर मत थोपिए। आपके शब्दों से हमें क्रोध नहीं, केवल तरस आता है।”

आकांक्षा उनकी शांति को कमजोरी समझ बैठी थी। उसने तंज कसते हुए कहा—
“चुप रहने से आप सही नहीं हो जाते।”
राजेन्द्र सर ने पहली बार दृढ़ता से उसकी आँखों में देखा—
“मेरी चुप्पी मेरी कमी नहीं। आग वहाँ लगाइए जहाँ से आपके अपने दामन तक उसकी लपटें न पहुँचे। ऐसी जगह आग लगाने से क्या लाभ, जो दूसरों से पहले आपको ही जला दे? बातों को बढ़ाकर मायने बदल देना शायद आपका खेल हो, पर उससे किसी को कितना कष्ट होता है, इसका अंदाज़ आपको नहीं।”

कमरे में सन्नाटा फैल गया। आकांक्षा पहली बार असहज हुई। वह स्वयं को सुंदर समझती थी और यही सोचती थी कि सुंदरता ही पर्याप्त है, पर राजेन्द्र के शब्दों ने उसकी सबसे बड़ी कमी खोलकर रख दी—उसे सुंदर सूरत मिली थी, लेकिन सुंदर सीरत नहीं।

धीरे-धीरे स्टाफ रूम से लोग निकल गए। आकांक्षा एक कोने में बैठी थी—पहली बार अपनी सोच के धुएँ में खुद को घिरा हुआ महसूस करती हुई।
राजेन्द्र सर ने अपनी फाइलें उठाईं और बाहर निकलते समय बस इतना कहा—
“ईमानदार लोग कमज़ोर नहीं होते, बस लड़ाई हर जगह नहीं करते।”
उस दिन विद्यालय में एक छोटी-सी घटना ने बड़ा सबक दे दिया। कभी-कभी धुआँ फैलाने वालों को पता नहीं चलता कि सबसे पहले उनकी ही साँस रुकती है।

राजेन्द्र सर के शांत लेकिन दृढ़ शब्दों के बाद विद्यालय में माहौल कुछ दिनों तक बिल्कुल बदला-बदला था। जहाँ पहले आकांक्षा की बातें कुछ लोगों पर प्रभाव डाल देती थीं, अब वही लोग उससे दूरी बनाने लगे थे।
सबके मन में एक ही सवाल था— आख़िर उसने ऐसा किया क्यों?
प्रधानाचार्य श्री रमेश वर्मा अनुभवी और गहरी दृष्टि वाले व्यक्ति थे। उन्होंने वर्षों में अनगिनत विवाद और गलतफहमियाँ देखी थीं—
लेकिन यह मामला सामान्य नहीं था। एक दिन उन्होंने दोनों को अलग-अलग अपने कक्ष में बुलाया।

राजेन्द्र सर से पूछा तो वे सामान्य स्वर में बोले— “सर, उनके शब्दों से मुझे कोई चोट नहीं। बस इतना कहूँगा कि अशुद्ध विचारों का उत्तर देना समय की बर्बादी है। मैं अपना काम पूरी निष्ठा से करता रहूँगा।”
प्रधानाचार्य ने संतोष से सिर हिलाया। उन्हें ऐसे शिक्षक विरले ही मिलते थे। पर जब उन्होंने आकांक्षा को बुलाया, तो स्थिति अलग थी।
आकांक्षा ने अपने ही बनाए जाल में उलझकर फिर वही बढ़ा-चढ़ाकर बातें दोहरानी शुरू कर दीं।

लेकिन प्रधानाचार्य के चेहरे पर अब कठोरता थी। उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा—
“आकांक्षा जी, विद्यालय चरित्र और शिक्षा का मंदिर है, इमेज बनाने का स्टेज नहीं। अगर आपको लगता है कि किसी सहकर्मी को गिराकर आप ऊँची लगेंगी, तो यह आपका भ्रम है। आपके शब्दों में अधिक नाटक और कम सत्य दिखाई देता है।”

आकांक्षा को पहली बार लगा कि उसके तीर उल्टे उसी पर चल पड़े हैं। बच्चे अक्सर वही समझ जाते हैं जो बड़े छिपा नहीं पाते।
राजेन्द्र सर का स्वभाव उन्हें बहुत प्रिय था— वे उन्हें कहानियों के माध्यम से नैतिकता समझाते, प्यार से पढ़ाते और हर बच्चे का नाम याद रखते थे।

एक दिन कक्षा 6 के दो छात्र स्टाफ रूम में बात कर रहे थे— “राजेन्द्र सर सबसे अच्छे हैं। उनके बारे में किसी को गलत नहीं बोलना चाहिए।”
आकांक्षा यह सुनकर भीतर तक हिल गई।

वह बच्चों का सम्मान खोना नहीं चाहती थी— क्योंकि उसे पता था कि सच्चा सम्मान बच्चों के दिल से मिलना सबसे कठिन और सबसे मूल्यवान होता है।

एक दिन अवकाश के दौरान विद्यालय में अचानक छोटे स्टोररूम में धुआँ उठने लगा। किसी ने गलती से पुरानी कॉपियों के ढेर के पास जलती अगरबत्ती रख दी थी।

भीतर आग धीरे-धीरे फैलने लगी। सब घबराकर बाहर भागे— पर स्टोररूम के पास खड़ी आकांक्षा को धुआँ घेरने लगा। सबसे पहले दौड़कर पहुँचे राजेन्द्र सर।

उन्होंने बिना सोचे-समझे दरवाज़ा खोला, अंदर जाकर आकांक्षा को बाहर खींचा और पानी से भरी बाल्टी उठाकर आग पर डाल दी। कुछ ही मिनट में आग बुझ गई।

आकांक्षा काँप रही थी। पहली बार उसकी आँखों में डर नहीं, पछतावा था। उसने धीमे स्वर में कहा—
“सर… मैं…” पर शब्द आगे नहीं बढ़ पाए।
राजेन्द्र सर बस इतना बोले— “मैंने वही किया जो किसी भी इंसान को करना चाहिए।

गलतियाँ हम सबसे होती हैं, पर उन्हें दोहराना नहीं चाहिए।”

आकांक्षा की आँखें भर आईं। वह समझ गई थी कि आग दूसरों के चरित्र पर लगाने की हो या स्टोररूम में— सबसे पहले नुकसान करने वाली भी वही होती है और सबसे पहले जलने वाली भी वही।
इसके बाद आकांक्षा का व्यवहार बदलने लगा। वह पहले की तरह तेज और कटु नहीं बोलती थी। कभी-कभी वह स्वयं भी अपनी कही पुरानी बातों पर शर्मिन्दा हो जाती।

विद्यालय के हर कोने में यह स्पष्ट था कि अग्निकांड की वह घटना किसी भौतिक आग से अधिक, मन में लगी आग को बुझा गयी थी।
स्टोररूम की आग की घटना के बाद विद्यालय का माहौल कुछ शांत-सा हो गया था, पर आकांक्षा के भीतर एक तूफान चल रहा था। हर दिन जब वह राजेन्द्र सर को बच्चों के बीच सहज, शांत और स्नेहपूर्ण देखती, उसे अपनी ही कही हुई बातें याद आ जातीं— वे बढ़ा-चढ़ाकर फैलाए हुए आरोप, वे ताने, वे बेमतलब की कहानियाँ, और वह ग़लत तस्वीर जिसे उसने पूरे स्टाफ के सामने प्रस्तुत किया था। पर अपने मन का बोझ सिर्फ़ भीतर रखने से कम नहीं होता।

अंततः एक दिन वह साहस जुटाकर स्वयं ही प्रधानाचार्य के कक्ष में पहुँची। “सर, मुझे आपसे कुछ कहना है…” उसकी आवाज़ धीमी और काँपती हुई थी।
प्रधानाचार्य ने उसे ध्यान से देखा।
“कहिए, मैं सुन रहा हूँ।”
आकांक्षा की आँखों में आँसू भर आये।
“सर… मैंने राजेन्द्र सर के बारे में जो बातें फैलाई थीं… उनमें से कुछ भी सच नहीं था।

मुझे अब समझ में आ गया है कि मैंने न सिर्फ उनके साथ अन्याय किया, बल्कि अपने चरित्र को भी धूमिल किया।”
कमरे में कुछ पल मौन रहा।
प्रधानाचार्य ने धीमे स्वर में कहा—
“गलती स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है। लेकिन याद रखिए, विश्वास टूट जाए तो इसे वापस पाने में समय लगता है।”
आकांक्षा चुपचाप सिर झुकाए रही। उसका स्वर लगभग फुसफुसाहट था— “मैं कोशिश करूँगी, सर।”

अगले सप्ताह नियमित स्टाफ मीटिंग रखी गई। सभी शिक्षक उपस्थित थे। लेकिन इस बार माहौल अलग था— आकांक्षा अपनी कुर्सी से उठकर सबके सामने आयी।
“आज मैं आप सबके सामने एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ,” उसने बोलना शुरू किया, “मैंने भावनाओं, असुरक्षा और अज्ञानता में आकर राजेन्द्र सर के बारे में गलत बातें कही थीं। जो कुछ भी मैंने कहा… वह मनगढ़ंत था। मैंने किसी की शांत स्वभाव को अपनी गलत सोच के चश्मे से परखा और… मुझे इसका गहरा पछतावा है।”

सब लोग चौंक गए। ऐसा साहस कम देखा जाता है। आकांक्षा की नज़र अंत में राजेन्द्र सर पर गई। उसके स्वर में कंपन था— “सर, मैं आपसे दिल से क्षमा चाहती हूँ। आपने मेरे लिए जो किया… उसके बाद तो मुझे अपने किए पर और भी लज्जा आ रही है।” कमरे में सबकी निगाहें राजेन्द्र सर पर ठहर गईं।
राजेन्द्र सर धीरे-धीरे खड़े हुए।

“आकांक्षा जी! गलती कभी-कभी इंसान करता नहीं—उससे करवाई जाती है। महत्त्वपूर्ण यह है कि उसने उसे स्वीकार कर लिया। मेरी दृष्टि में वही व्यक्ति महान है जो सच का सामना कर लेता है।”
फिर उन्होंने बहुत सहज स्वर में कहा— “मैं आपकी क्षमा स्वीकार करता हूँ और आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि मन की आग किसी को उजाला नहीं देती… बस जलाती है। जिस दिन हम इसे बुझा लेते हैं, उसी दिन नया आरम्भ होता है।”

आकांक्षा की आँखों में राहत के आँसू थे— पहली बार किसी ने उसे उपदेश नहीं, समझ दी थी।
स्टाफ रूम में तालियाँ गूँज उठीं।
राजेन्द्र सर ने बिना गुस्से या कटुता के जिस तरह इस स्थिति को संभाला था, उससे सबका सम्मान और बढ़ गया।

उस दिन के बाद से आकांक्षा का व्यवहार सचमुच बदल गया। उसकी आवाज़ से कटुता गायब हो चुकी थी। अब वह अन्य शिक्षकों के साथ सहज और विनम्र होकर बात करती।
राजेन्द्र सर से वह एक अजीब-सी दूरी बनाए रखती, पर वह दूरी सम्मान की थी— और शर्म की भी।

धीरे-धीरे सभी ने उसे स्वीकार कर लिया और विद्यालय में मानवता, समझ और परिपक्वता का एक नया संदेश फैल गया— अच्छे लोग कमज़ोर नहीं होते।

वे बस लड़ाई हर जगह नहीं करते। लेकिन जब सच का आईना सामने रखते हैं, तब सबसे गहरी झलकती है— स्वयं की परछाई।
समय बीतने लगा। विद्यालय में पढ़ाई और दिनचर्या फिर सामान्य हो गयी, पर सबके भीतर एक बदलाव गहराई में उतर चुका था— एक सीख, एक अनुभव, एक परिपक्वता।

आकांक्षा अब पहले जैसी नहीं रही थी। उसके व्यवहार में विनम्रता और समझ आ गई थी। वह अक्सर कक्षा के बाद अकेली बैठकर सोचती— “कितना आसान था किसी पर उंगली उठाना और कितना कठिन है स्वयं को समझना…” धीरे-धीरे उसके भीतर की दूषित भावनाएँ धूल की तरह गिरने लगीं।

वह समझ चुकी थी कि सुंदर सूरत जीवन को सजाती है, पर सुंदर सीरत जीवन को संभालती है।
राजेन्द्र सर अपने मौन, अपनी सादगी और अपने कर्तव्य में पहले की तरह लगे रहे। पर एक बात बदल गई— अब वे आकांक्षा को कभी-कभी एक गुरु की दृष्टि से देखते।

उन्होंने महसूस किया कि मनुष्य को गिराने से नहीं, उसे उठने का अवसर देने से ही समाज की सुंदरता कायम रहती है।
एक दिन स्टाफ रूम में आकांक्षा धीरे से उनके पास आई और बोली—
“सर, मैंने बहुत कुछ सीख लिया है…
आपके आचरण ने ही मुझे परिवर्तन का रास्ता दिखाया।”

राजेन्द्र सर मुस्कुराए, और बोले— “मनुष्य तभी पूर्ण होता है जब वह अपनी कमियों का सामना कर उन्हें बदलने का साहस रखे। हमें अपने भीतर की आग बुझानी है— दूसरों को नहीं।”
आकांक्षा ने सिर झुकाकर ‘धन्यवाद’ कहा।
वह जानती थी, यह एक शब्द नहीं, उसकी नयी जीवन-यात्रा का पहला कदम था।

धीरे-धीरे पूरे विद्यालय में यह कहानी फैल गई— किसी के बदनाम होने की नहीं, बल्कि किसी के सुधरने की। अब शिक्षक एक-दूसरे की नीयत पर सवाल उठाने से पहले दो बार सोचते थे।
ग़लतफहमियाँ पहले जैसी तीखी नहीं होती थीं। बच्चे भी अपने शिक्षकों में एक नई एकजुटता और आदर्श देखते थे। विद्यालय के वातावरण में विश्वास, संयम और सम्मान की खुशबू रच-बस गई।

एक वार्षिक कार्यक्रम में प्रधानाचार्य ने भाषण देते हुए कहा— “हमारे विद्यालय में सिर्फ किताबें ही नहीं पढ़ाई जातीं… हम यहाँ चरित्र, धैर्य और सत्यनिष्ठा भी सीखते हैं और कभी-कभी एक घटना हमें वह सिखा जाती है जो सैकड़ों किताबें भी नहीं सिखा पातीं।”
सब लोग ताली बजा रहे थे।
राजेन्द्र सर शांत बैठे थे।
आकांक्षा की आँखों में गर्व और विनम्रता दोनों थे।
वह समझ चुकी थी— सच्चाई वह रोशनी है जो हमें भीतर से उजाला देती है।
और ईमानदार लोग वही दीपक होते हैं जो बिना बोले भी राह दिखा देते हैं।