नागवल्ली का मित्रताधर्म

राघवेन्द्र कुमार "राघव" प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24

नागवल्ली का मन आज रासरङ्‌ग में नहीं लग रहा था। रह-रह कर उसे पङ्‌खुड़ी की याद आ रही थी। वह याद कर रही थी कि बाल्यकाल से तरुण होने कभी भी हम दोनो बहने अलग नहीँ हुईं। वास्तव मे पङ्खुड़ी उसके राज्य की एक अनाथ लड़की थी और नागवल्ली की अत्यन्त प्रिय और विश्वासपात्र सहेली थी। पङ्खुड़ी अप्रतिम सौंदर्यस्वामिनी थी, वहीं नागवल्ली अत्यन्त मजबूत इरादों वाली एक कुशल योद्धा थी। दोनो सहचरी और अन्तरङ्‌ग साथी थीं।

पङ्‌खुड़ी पिछले एक सप्ताह से नागवल्ली से मिली नहीं थी। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि पङ्‌खुड़ी दिन में एक बार भी नागवल्ली से भेंट न करती। सहेली की चिन्ता मे धीरे-धीरे नागवल्ली अवसादग्रस्त रहने लगी। उसने अपने कक्ष से निकलना भी बंद कर दिया। उसे भोजन आदि से अरुचि हो गई। नागवल्ली के पिता नागागार्जुन को जब राजकुमारी के अन्न-जल त्यागने की सूचना दी गयी तो वह परेशान हो उठे। नागार्जुन चन्दनवन का प्रतापी राजा था। चिंतित नागार्जुन राजसभा से उठा और सीधे राजकुमारी नागवल्ली के कक्ष में जा पहुँचा। पिता को सामने देख नागवल्ली उच्च स्वर में विलाप करने लगी। पिता द्वारा पूछने पर नागवल्ली ने पङ्‌खुड़ी के अचानक कहीं चले जाने के बारे मे नागार्जुन को सब बताया। उसने राजाज्ञा दी कि जो भी पङ्‌खुड़ी के विषय में सूचना देगा उसे एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएंगी। इसके साथ ही राज्य के सभी गुप्तचरों को भी पङ्‌खुड़ी की खोज में लगा दिया गया। इतना सब करने के बाद भी पङ्खुड़ी का कोई पता न चल सका।

एक दिन अचानक चन्दनवन मे एक साधु का आगमन हुआ। साधु कावेरी तट के समीप जंगल मे साधनारत था और कुछ विशेष कार्य के लिए वह चन्दनवन आया था। एक मन्दिर के समीप साधु ने स्थानीय जन से एक कन्या के अपहरण की बात सुनी। उसे याद आया कि एक पखवाड़ा पहले जब वह कावेरी के जल मे सन्ध्योपासना से पूर्व स्नान कर रहा था तो कुछ दुष्ट एक कन्या को बलात् लिये जे रहे थे। उसने वहाँ उपस्थित लोग से बताया कि जब मैं संध्या के लिए जल लेने गया था उस समय कुछ अश्वारोही एक कन्या को वस्त्रों में लपेटे लिये जा रहे थे। मैने उनसे उसे मुक्त करते का आग्रह भी किया था। जब वह नहीँ माने तो मैने अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रतिकार भी किया किन्तु वह संख्याबल मे अधिक थे इसलिए मुझे घायल कर चले गये। शीघ्र ही यह सूचना राजा को मिली और राजा ने कुछ गुप्तचरों के साथ सैनिकों को साधु की बतायी दिशा मे दौड़ा दिया। अगले ही दिन घबराए हुए सैनिक उपस्थित हुए और राजा से कहा कि स्वामी हमारे राज्य की कन्या को जंग‌लों में रहने वाले दस्यु उठा ले गए हैं। राजन सुनने में यह भी आया है कि द्वीप क्षेत्र के हमारे शत्रु राजा सर्वांतक की इच्छा से यह अपहरण किया गया है, वह पङ्खुड़ी को नागवल्ली समझकर राजवन से उस समय उठा ले गए जब वह पुष्प चुनने गयी थी। पूरी बात सुनने के बाद राजा के मंत्रियों ने आपस मे मंत्रणा कर यह सुझाव दिया कि एक कन्या के लिए राज्य को युद्ध की विभीषिका में झोंक देना उचित प्रतीत नहीं होता। इसी बीच सेनापति धूमकेतु म्यान से तलवार खींच कर बोला कि यदि पङ्‌खुड़ी के स्थान पर वास्तव मे हमारी प्रिय राजकुमारी का अपहरण हो गया होता तो भी क्या आप यही सुझाव देते। पङ्खुड़ी केवल एक कन्या नहीं है, वह हमारी राजकुमारी की बहन के समान प्रिय सहेली है और उसी के धोखे मे उसका अपहरण हुआ है। हमारे राज्य की प्रत्येक मातृशक्ति चन्दनवन की अस्मिता है। यदि की आज हमलोग पङ्खुड़ी को उसके हाल पर छोड़ देते हैं तो यह केवल पङ्‌खुड़ी के साथ नहीं अपितु पूरे राज्य की कन्याओं के साथ विश्वासघात होगा। चन्दनवन के वीरों की तलवारों में लगा रक्त इस बात का प्रमाण है कि हम शीश उतारने और शीश चढ़ाने में सदैव आगे रहे हैं। हम युद्ध करेंगे। अब चाहें सम्पूर्ण संसार इन दुष्ट दस्युओं को बचाने पर उतर आए तब भी उन्हें और सर्वांतक को किये का फल देना ही होगा। वीर धूमकेतु की बात सुनकर राजसभा मे सन्नाटा छा गया।

एक वीर की वीरता और शौर्य सैकड़ो मंत्रियों के बुद्धिबल पर भारी पड़ रहा था। राजा ने सभासदों से कहा कि एक ओर मंत्रिपरिषद की समयानुकूल सलाह है और दूसरी ओर हमारे वीर सेनापति का न्यायसंगत और वीरोचित निर्णय। हम लोग अगले दिन इस बात पर विचार करेंगे कि क्या निर्णय लेना है? सभा अगले दिन के लिए प्रतीक्षारत हो गयी। जैसे ही ये बात राजमहल मे वीराङ्गना नागवल्ली को पता चली वह भी धूमकेतु के पक्ष मे आ खड़ी हुई और पितामहाराज से युद्ध मे शामिल होनी की इच्छा जतायी। राजमहल के बाहर प्रजा को जब यह सब पता चला तो लोग सेनापति के पक्ष के एकजुट होने लगे। जंगल मे आग की तरह यह बात पूरे राज्य में फैल गयी। सेठ-साहूकारों को छोड़कर अधिसंख्य प्रजाजन धूमकेतु के पक्ष में जा खड़े हुए। अगले दिन जैसे ही राजसभा में कार्यवाही शुरू हुई तो राजसभा के बाहर मसल के विशाल प्रांगण में सहस्राधिक प्रजाजन उपस्थित हो गए और वहाँ उच्च स्वर में धूमकेतु की जय-जयकार होने लगी। प्रजाजन का घोष “धर्मकेतु की जय हो! हम धूमकेतु के साथ है! महाराज की जय हो! हम युद्ध को तैयार हैं!” धीरे-धीरे पूरे राज्य मे गूँजने लगा। राजसभा में बैठे हुए प्रत्येक व्यक्ति के कर्णपटल से ये शब्द लगातार टकरा रहे थे। अंततः राजा ने युद्ध‌घोष की आज्ञा दे दी। वैसे भी नागवंशी राजा अपने युद्ध कौशल और वीरता के लिए सदैव से विख्यात रहे हैं। अगले ही दिन राजकुमारी नागवल्ली और धर्मकेतु के नेतृत्व में नागवंशी सेना दुष्टों के संहार को वैसे ही चल पड़ी जैसे प्रलय काल के बादल समूची धरती को डुबा देने के लिए उमड़ने-घुमड़‌ने लगते हैं। शीघ्र ही कावेरी को पार कर सेना ने व्यूह की रचना करते हुए दस्युओं को घेर लिया और देखते-देखते उनका ऐसा सफाया कर दिया जैसे टिड्डी दल खेत की फसलों का सफाया कर देते हैं। जैसे ही दस्युओं के संहार की यह सूचना सर्वांतक को मिली वह काँप उठा। उसने मित्र राजाओं और नागवंश के शत्रुओं से साथ देने का अनुरोध किया। लेकिन दस्युओं के संहार का दृश्य देखकर और यादकर किसी भी राजा की युद्ध में सहायता करने की हिम्मत न हुई।

अंत में सर्वांतक ने पङ्खुड़ी को नागवल्ली को सौंपकर आत्मसमर्पण कर दिया। धूमकेतु ने सर्वांतक को बन्दी बनाकर उसके राज्य को नागवंश में मिला लिया। धूमकेतु की वीरता से एक कन्या का अस्तित्व मिटने से बच गया। नागवल्ली ने अपने पिता महाराज से धूमकेतु को अपना युवराज बना लेने का आग्रह किया। नागार्जुन ने नागवल्ली के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी। नागवल्ली और धूमकेतु की यह जीत की न केवल मित्रता की जीत थी अपितु एक कन्या के बहाने सम्पूर्ण नारीजाति की जीत थी। नागवल्ली की सहमति और महाराज नागार्जुन के आशीर्वाद से घूमकेतु ने पङ्खुड़ी से विवाह कर लिया। सभी नागवल्ली के मित्रताधर्म की प्रशंसा कर रहे थे।आज नागवल्ली बहुत प्रसन्न थी और पङ्खुड़ी से लिपटकर रोये जा रही थी। नागवल्ली के ये आँसू उसकी खुशी और प्रेम का परिचय दे रहे थे।