राघवेन्द्र कुमार राघव–
रिश्ते पर धूल जमी हो तो
धूल उड़ा दो यारों।
दुनिया में ग़म ही तो हैं
खुशियों को ढूंढों यारों।
सभी चढ़ें हैं वक्त के रथ पर
यूँ ना उम्र गुजारो।
एक बार यदि ये गुजरी
तो फिर वापस ना आयेगी।
तुम सबका सम्मान करो
दिल की अपने सुना करो।
रिश्ते को जो चाट रही
उस दीमक को साफ करो।
जिन्दा रहने को सांस जरुरी
जिन्दा दिखने को जज्बात जरूरी।
जज्बात चाहते गहरे रिश्ते
करो खत्म रिश्तों मे दूरी।
कौन जानता कब तक जीवन?
कब तक आशा और निराशा?
रहो हमेशा हँसते खिलते
जीवन की ये ही परिभाषा।
सब अपने और सभी गैर हैं
कभी दोस्ती कभी वैर है।
किसने अगला दिन देखा है
सबकी सीमित जीवन रेखा है।
क्या हुआ जो मन का हुआ नहीं?
बिना आग के धुआँ नहीं।
अपनी भूलें स्वीकार करो
जीवन ना बर्बाद करो।
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