बहुत कुछ कह जाते हैं, पाँच राज्यों के चुनाव-परिणाम

३ दिसम्बर को चार राज्यों के जो चुनाव-परिणाम आये थे, उनमे से दो राज्यों के परिणाम निश्चित रूप से आशा और विश्वास के विपरीत दिख रहे हैं। उसके अगले दिन मिज़ोरम राज्य का चुनाव-परिणाम भी अप्रत्याशित रहा; क्योंकि वहाँ दलीय स्थिति त्रिशंकु की दिख रही थी।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का प्रदर्शन परिणाम आने से पूर्व प्रभावकारी दिख रहा था। जिस तरह से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के चुनावी जनसभाओं मे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान मे अपार जनसमर्थन मिल रहा था, उससे लग रहा था कि मतदाता उनके साथ हैं; लेकिन परिणाम ठीक उसके विपरीत दिख रहे हैं। इसे क्या समझा जाये? क्या भीतर-ही-भीतर भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के विरुद्ध षड्यन्त्र का खेल चल रहा था अथवा विरोधी पाले से कुचक्र रचा गया था? इसे भी समझने की आवश्यकता है।

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का एक विवादास्पद प्रवक्ता प्रमोद कृष्णम् शुरू से ही सार्वजनिक रूप से अपने ही दल पर लगातार प्रहार करता आ रहा है, जिसका जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता रहा है; परन्तु दल का शीर्षस्थ नेतृत्व मौन बना हुआ है। ऐसे आत्मघाती कथन करनेवाले प्रवक्ता को हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए था। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की अप्रत्याशित पराजय को लेकर वह कथित आचार्य जिस प्रकार की नकारात्मक प्रतिक्रिया करता फिर रहा है, उससे उसका ‘विभीषण-चरित्र’ रेखांकित हो रहा है। इस दृष्टि से ऐसे भितरघातियों को दल और संघटन से बाहर का रास्ता दिखाना होगा।

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की नीतियाँ सुस्पष्ट नहीं दिख रही हैं। वह जिस राष्ट्रीय धारा का पोषक हुआ करती थी, उससे हटती नज़र आ रही है, जिससे उसका मौलिक चरित्र, स्वभाव तथा संस्कार दोहरा दिख रहा है। वह भी कृत्रिम हिन्दुत्व के रंग मे रँगी दिखती आ रही है। पूरे चुनाव मे वह भी भारतीय जनता पार्टी के नक़्शे क़दम पर चलती दिखी थी; कहीं उस मन्दिर मे जाना, कहीं हनुमान चालीसा का पाठ करना-कराना, चलता रहा। इससे उसकी वास्तविक रीति-नीति खोखली सिद्ध होती दिखी। हमे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राहुल गांधी का अन्य पिछड़े-वर्ग को आरक्षण देना और उन्हें अपने शासन मे महत्ता देना, सवर्णो को खल गया था, जिसका परिणाम उसे बुरी तरह से भुगतना पड़ा है।

यहाँ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को अपनी सांघटनिक सुदृढ़ता का अभाव दिखता है। उसका जनाधार क्या है, इसे समझना होगा। हम यदि उसके जनाधार की बात करते हैं तो हमारे सामने चार ही वर्ग दिखते आ रहे हैं :– पहला, निर्धन; दूसरा अन्य पिछड़ा-वर्ग; तीसरा, आदिवासी तथा चौथा, मुसलमान। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को अपनी नीतियों और घोषणाओं को सम्बन्धित मतदाताओं तक कैसे पहुँचायें, जिससे कि उसका ठोस प्रभाव दिखे, इस पर चिन्तन करना होगा। जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ‘पन्ना-प्रमुख’ का एक प्रभावकारी इकाई गठित कर, मतदाताओं को अपने पक्ष मे प्रभावित करती आ रही है उसी तरह से उसे भी अपना एक प्रकोष्ठ गठित कर, अपनी नीतियों का प्रचार-प्रसार कर, जनमत तैयार करना होगा।

हम यदि अविश्वसनीय चुनाव-परिणाम के संदर्भ मे मुख्य निर्वाचन-आयुक्त की भूमिका को संदेह की दृष्टि से देखते हैं तो इसमे कुछ भी ग़लत नहीं है; क्योंकि जब विपक्षी दल सप्रमाण शिकायत करता है तो उसकी सुनी ही नहीं जाती है और यदि अति लघु स्तर की शिकायत मोदी ऐण्ड कम्पनी की ओर से की जाती है तो निर्वाचन आयोग के अधिकारी उस पर काररवाई शुरू कर देते हैं; क्योंकि सत्तापक्ष की ओर से उनपर वैसा करने के लिए दबाव डाला जाता है। जिस तरह से मतगणना-आरम्भ होने के समय से ही रुझान आनी शुरू हुई थे, वे किसी भी क़ीमत पर विश्वास करने-लायक़ नहीं थी; क्योंकि ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ ने जिस रुचि के साथ प्रमुख निर्वाचन-आयुक्त की नियुक्ति करायी थी, उसी से ज़ाहिर हो गया था कि उसके पीछे का उसका इरादा क्या है। भारतीय जनता पार्टी की शिवराज-सरकार ने जिस तरह से भ्रष्टाचार और अन्य आपराधिक कृत्यों को बढ़ावा दिया था। ‘व्यापमं’ काण्ड, ‘पटवारी भरती परीक्षा-घोटाला’, ‘आदिवासी-मूत्र-काण्ड, बड़ी संख्या मे महिला-दुष्कर्मकाण्ड, हत्याकाण्ड आदिक घटनाओं के कारण ऐसा लग रहा था कि मध्यप्रदेश मे भारतीय जनता पार्टी की करारी हार होगी; लेकिन परिणाम ठीक उलटा आता दिखा है। यदि वे परिणाम बिना किसी बेईमानी के घोषित हुए हैं तो इससे सिद्ध हो जाता है कि सम्बद्ध मतदाताओं को भ्रष्टाचार पसन्द है। यहाँ एक और विषय उल्लेखनीय है; और वह यह कि मतदान की तारीख़ से दो दिनो- पूर्व कमलनाथ ने यह घोषणा कर दी थी:– जो भी अधिकारी मनमानी कर रहे हैं, उनकी लिस्ट बनाओ; हमारी सरकार बनते ही उन सबके विरुद्ध काररवाई होगी। उसका परिणाम यह हुआ कि बेईमान क़िस्म के वे सब अधिकारी कमलनाथ के विरुद्ध लामबन्द हो गये थे। हमे शिवराज सिंह चौहान की मतदान से पूर्व ‘लाडली बहन योजना’ की घोषणा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जिसका परिणाम रहा कि वहाँ कि कथित लाडली बहनो ने एक मत से शिवराज मामा के पक्ष मे मतदान किया था।

एक बात और सुस्पष्ट हो चुकी है कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने जिस ओ० बी० सी०-समुदाय और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति महिलाओं पर विश्वास किया था, उसने उसे पूरी तरह से ख़ारिज़ कर दिया है।

यदि कोई यह कहे कि यहाँ पर ‘मोदी-मैजिक’ का असर हुआ है तो यह पूरी तरह से सच नहीं है। सच तो यह है कि ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ ने आगामी लोकसभा-चुनावों के मद्देनज़र तीन राज्यों मे खेल कराये हैं; क्योंकि उड़ती हुई यह बात भी सामने आ रही थी कि पाँच राज्यों के चुनाव-परिणाम के आधार पर नरेन्द्र मोदी के आगे का राजनीतिक भविष्य तय किया जायेगा; क्योंकि यह भी सुनने मे आ रहा था कि कर्नाटक मे बहुत बुरी तरह से पराजय के चलते, मोदी की घटती लोकप्रियता को लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अधिकारी चिन्तित थे और वे किसी विकल्प की तलाश मे लगे हुए थे; संघ के क़रीब नितिन गडकरी आ चुके थे, जो कि अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ छवि के राजनेता हैं और दल मे उनकी प्रभावमयी भूमिका है।

दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का सफ़ाया हो जाना, किसी भी तरह से गले उतर नहीं रहा है; क्योंकि वहाँ के मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल की जो लोकप्रियता उनके राज्य मे रही है; किसानो के लिए जितना हितकारी कार्य किया है, उससे सुस्पष्ट हो रहा था कि वहाँ भूपेश बघेल के दल को स्पष्ट बहुमत मिलेगा। जितने भी तन्त्र और चुनावी पण्डितों ने छत्तीसगढ़ मे भूपेश बघेल के पक्ष मे अपने सर्वेक्षण और पूर्वानुमान को बताये थे, उन्हें पलक झपकते ही झुठला दिया गया। छत्तीसगढ़ मे ऐसा परिणाम कैसे आया, शोचनीय स्थिति है। हमे नहीं भूलना चाहिए कि निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने की अवधि मे नरेन्द्र मोदी ऐण्ड कम्पनी ने भूपेश बघेल के विरोध मे ‘महादेव ऐप्प’ का खेल कर दिया था तथा अपने तथाकथित ई० डी० और सी० बी० आइ० का खुला दुरुपयोग कर, जनमानस मे बघेल के विरुद्ध नकारात्मक संदेश का प्रचार-प्रसार किया था। बघेल के विधायकों मे भी एकजुटता नहीं दिख रही थी; दूसरी ओर, भूपेश बघेल का अपनी विजय के प्रति अतिरिक्त आत्मविश्वास उन्हें ले डुबा। यदि कोई यह कहे कि उस सरकार के जनहित-विरोधी नीतियों का परिणाम उसे मिला है तो मध्यप्रदेश मे शासन करनेवाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी जनविरोधी नीतियों का दुष्परिणाम मिलना चाहिए था, जो कि उसे नहीं मिला। प्रश्न है, एकपक्षीय दुष्परिणाम क्यों?

हाँ, राजस्थान मे भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के बीच टक्कर होना दिख रहा था, जिसका मुख्य कारण वर्षों तक गहलौत-समर्थक बनाम पायलट-समर्थक की रस्साकशी थी, जिसे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के शीर्षस्थ नेतृत्व ने गम्भीरता से नहीं लिया था। ऐन मौक़े पर ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ ने ‘लाल डायरी’ का जो खेल खेला था; ‘पेपर-लीक’, ‘कन्हैया हत्याकाण्ड’ को जिस घिनौने तरीक़े से प्रस्तुत किया था, उसका दुष्परिणाम राजस्थान मे दिखा है। राजस्थान मे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का पराभव उसका सत्ता मे रहना था; क्योंकि प्राय: देखा गया है कि जिस दल की सरकार होती है, उसकी नीतियों का प्रभाव जनता पर पड़ता है। राजस्थान मे ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ का ध्रुवीकरण भरपूर लाभ दे गया है; क्योंकि अशोक गहलौत ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’ का खेल खेलते आ रहे थे, जिसकी प्रतिक्रिया रही कि गहलौत के विरुद्ध हिन्दू लामबन्द होते दिखे, परिणामत: भारतीय जनता पार्टी के पक्ष मे थोक के भाव मत पड़े थे, जिसे यदि गहलौत पहले ही भाँप लिये रहते तो परिणाम कुछ और हो सकता था।

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के ज़ख़्म पर मरहम लगाने के लिए ‘तेलंगाना’ के मतदाताओं ने साथ दिया है, जहाँ उसने बी० आर० एस०, बी० जे० पी० तथा ओबैसी को बुरी तरह से तेलंगाना की राजनीति से उठा बाहर किया है जिसकी पूरी उम्मीद थी; लेकिन भा० ज० पा० ने अपनी वहाँ भी उपस्थिति दर्ज़ करा दी है।

यहाँ जिस तरह से दोनो दल की ओर से ‘मुफ़्त की रेवड़ी’ बाँटने की खुली घोषणा की गयी थी, वह समाज-विभाजक नीति सिद्ध हो रही है; मोदी की ओर से मुफ़्त का राशन देने की योजना को लगातार करने की जो घोषणा की गयी थी, उसे लेकर मुफ़्तख़ोरों ने उनके पक्ष मे मतदान किये थे।

देश की जनता को संकीर्ण विचारधारा और गर्हित राजनीतिक मानसिकता को अच्छी तरह से समझना होगा, अन्यथा लोकतन्त्र अपने विरूप और विद्रूप-अवस्था को ‘ज़िन्दा लाश’ की तरह से ढोते हुए दिखता रहेगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ५ दिसम्बर, २०२३ ईसवी।)