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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद: वैश्विक दायित्व को निभाने के लिए तैयार ‘न्यू इंडिया’

1 जनवरी 2021 से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गलियारे में भारतीय तिरंगा एक बार फिर से लहराने लगा है। इसके साथ ही सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के रूप में भारत ने अपना आठवां कार्यकाल प्रारम्भ कर दिया है। भारत 2021-22 के कार्यकाल के लिए एशिया-प्रशांत श्रेणी से गैर-स्थाई सीट का उम्मीदवार था। जिसके लिए बीते वर्ष जून में हुए चुनाव में भारत को 192 में से 184 मत मिले। वैश्विक आपदा कोरोना के कारण जिस तरह से वैश्विक राजनीति और कूटनीति का समीकरण बदला है, उसमें यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं था। कोरोना काल में जिस तरह से पूरी जिम्मेदारी के साथ ‘न्यू इंडिया’ ने अपनी भूमिका निभाई है उसे पूरी दुनिया ने सराहा है। यह चुनाव परिणाम वैश्विक स्तर पर मोदी के बढ़ते कद और विश्व समुदाय में भारत की बढ़ती साख को प्रदर्शित करता है।

यहां समझने की आवश्यकता है कि भारत के लिए अस्थाई सदस्य का यह दो वर्षीय कार्यकाल महत्वपूर्ण क्यों है? दरअसल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सबसे शक्तिशाली और संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है। यह एक संयुक्त राष्ट्र निकाय है जिसके पास सदस्य राष्ट्रों को बाध्यकारी प्रस्ताव जारी करने का अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संरक्षण इसकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। इसमें वीटो की शक्ति वाले पांच स्थायी देशों सहित 15 सदस्य होते हैं। पांच स्थायी सदस्य चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका हैं। 10 गैर-स्थायी सदस्य दो साल के लिए चुने जाते हैं। इसकी शक्तियों में शांति नियंत्रण संचालन की स्थापना, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की स्थापना, और यूएनएससी संकल्पों के माध्यम से सैन्य कार्रवाई के प्राधिकरण शामिल हैं।

इस निकाय के जरिए 1948 से अब तक दुनिया भर में चलाए गए 71 शांति अभियानों में से 49 में 200,000 से अधिक भारतीय सैनिकों ने अपनी सेवाएं दी हैं। इनमें सैनिकों के अलावा चिकित्सक, इंजीनियर और वैटनरी चिकित्सक भी शामिल हैं, जो युद्ध ग्रस्त क्षेत्रों में मानव सेवा का कार्य करते हैं। इससे यह बात सिद्ध होती है कि भारत भले ही इसका स्थाई सदस्य न बन पाया हो, लेकिन वैश्विक आवश्यकताओं को लेकर वह हमेशा दुनिया के साथ खड़ा रहा है। सही मायने में कहें तो कुछ वर्षों में जिस तरह से चीन ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी स्थिति को मजबूत किया है उस दौर में भारत के लिए दो वर्ष का सीमित कार्यकाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि विस्तारवाद की नीति पर चल रहे चीन को जवाब देने के लिए भारत को ऐसे ही किसी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच की आवश्यकता है, जहां से पूरी मजबूती के साथ वह अपनी बात रख सके।

वास्तव में विगत 6 वर्षों में विदेश नीति के हर मोर्चे पर सफल रही मोदी नीति राजग सरकार पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की गलतियों को सुधारना चाह रही है। 70 साल पहले नेहरू ने जिस चीन को भारत का दोस्त समझकर उसे वीटो पावर दिलवाई थी, वर्तमान में वही चीन कई मौकों पर भारत को न ही सिर्फ आंखे दिखाता रहा है, बल्कि उस पर हमला करने की भी ताक में रहता है। डोकलाम और लद्दाख में चीनी सेना द्वारा एलएसी का उल्लंघन इसका प्रमाण है। प्रधानमंत्री मोदी की मंशा नेहरू के समय स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ के स्वरूप में बदलाव और 130 करोड़ की जनसंख्या एवं विश्व की 18 प्रतिशत आबादी वाले देश को निर्णय की भूमिका दिलाने की है। इसको हम इस वैश्विक संगठन के गठन के 75 साल पूरे होने पर एक उच्च स्तरीय वर्चुअल आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण समझ सकते हैं। जिसमें उन्होंने कहा “1945 के बाद से इसमें (संयुक्त राष्ट्र संघ) बदलाव नहीं हुआ है, ऐसे में इस पुराने ढांचे की ओर अब देखना होगा। पिछले 8-9 महीने से पूरा विश्व कोरोना वैश्विक महामारी से संघर्ष कर रहा है। इस वैश्विक महामारी से निपटने के प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र कहां है? एक प्रभावशाली रिस्पांस कहां है? संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं में बदलाव, व्यवस्थाओं में बदलाव, स्वरूप में बदलाव, आज समय की मांग है।”

वैश्विक संकट कोरोना के दौरान सॉफ़्ट पॉवर बनकर उभरे भारत ने खुले हाथ और खुले मन से दुनिया के तमाम देशों की हर संभव मदद की। यही कारण रहा कि भारत को एशिया-प्रशांत श्रेणी में निर्विरोध जीत मिली, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थाई नहीं, बल्कि स्थाई सीट की दावेदारी को मजबूत करता है। महामारी के दौर में जहां विकसित देश सिर्फ अपनी चिंता कर रहे थे, वहां भारत अपना घर सम्हालने के साथ-साथ जगत कल्याण में लगा था। इस इस दौरान भारत ने विश्व के 154 देशों को 5 मिलियन अमेरिकी डालर की चिकित्सा सहायता भेजी। जिसमें पड़ोसी देशों के अलावा अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, मध्य और पश्चिम एशिया के देश शामिल थे। चिकित्सा आपूर्ति में परीक्षण किट, चिकित्सा उपकरण, हाइड्रोक्लोरोक्वीन, पैरासिटामोल, समेत अन्य जीवन रक्षक दवाएं भी शामिल थी। यही नहीं भारत सार्क देशों को भी एक बार फिर एक मंच पर साथ लाने में सफल रहा। भारत की तरफ से ‘सार्क कोविड-19 इमरजेंसी फंड’ में 2.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि की आवश्यक दवाओं, चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों, कोविड सुरक्षा और टेस्टिंग किट तथा अन्य उपकरणों की आपूर्ति भी उपलब्ध कराई गई। कबीर के दोहे “साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु ना भूखा जाय” को चरितार्थ करने वाले ये तथ्य इस बात का सबूत है कि अब दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम” के मन्त्र पर चलने वाले भारत के पहलकारी जरुरत है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बन जाने से सीमा पार आतंकवाद, आतंकी फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और कश्मीर जैसे मुद्दे पर भारत की स्थिति एक तरफ जहां मजबूत होगी। वहीं दूसरी तरफ देशों के बीच संघर्ष को रोकने, विकास को सुनिश्चित करने, जलवायु परिवर्तन और असमानता घटाने जैसे कई मुद्दों पर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित करना एक बड़ी चुनौती होगी। सही मायने में कहा जाए तो एक तरफ जहां यह भारत के लिए सम्मान की बात है, वहीं दूसरी तरफ कोविड गुजरने के बाद मिलने वाला वैश्विक दायित्व भी है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाला ‘न्यू एंड यंग इंडिया’ सक्षम दिख रहा है।

शांतनु त्रिपाठी (स्वतन्त्र पत्रकार)

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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