गणना-प्रसंग मे प्रेमचन्द के सम्मुख कोई ठहरता नहीं दिखता

प्रेमचन्द-जन्मतिथि (३१ जुलाई) की पूर्व-संध्या मे ‘सर्जनपीठ’ का साहित्यिक आयोजन

‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे विश्रुत कथाकार प्रेमचन्द की जन्मतिथि की पूर्व-संध्या मे ‘कथाकारों के गणना-प्रसंग मे प्रेमचन्द के बाद सर्वमान्य कथाकार कौन?’-विषयक एक आन्तर्जालिक अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन ३० जुलाई को ‘सारस्वत सदन’, अलोपीबाग़, प्रयागराज से किया गया, जिसमे देश-देशान्तर के साहित्यकारों और शिक्षाविदों की सक्रिय सहभागिता रही।

विजिटिंग प्रोफ़ेसर– स्टेट युनिवर्सिटी ऑव़ अमेरिका डॉ० नीलम जैन का मत है, “मुंशी प्रेमचन्द ने समाज की गहराई मे पैठकर सत्य का उद्घाटन किया था; ग़रीबी, शोषण, दमन, अत्याचार तथा मध्यवर्गीय विसंगतियों के साथ उच्च वर्ग के पाखण्ड-शोषण के अजीबोग़रीब दमनचक्र और हथकण्डों को भी देखा था। जीवन का प्रत्येक पक्ष उनके विस्तृत अनुभवों से अनुस्यूत था, जो उनके क़लम की नोक पर रहे।”

 देवरिया से साहित्यकार एवं समीक्षिका प्रियंवदा पाण्डेय ने विचार व्यक्त किया, " प्रेमचन्द ने कथाक्षेत्र मे जो प्रतिमान स्थापित किया है, वह अनुकरणीय है। आरम्भिक कहानियों में जहाँ वे आदर्श से यथार्थ की ओर अग्रसर हुए हैं, वहीं उन्होंने पंच परमेश्वर मे ग्राम पंचायत के आदर्श, नमक का दरोगा में नौकरी की ईमानदारी तथा बड़े घर की बेटी में संयुक्त परिवार की मर्यादा की प्रतिष्ठा की है।"

आयोजक भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, "प्रेमचन्द ने देखा कि समाज मे धार्मिक अन्धविश्वास, सामाजिक रूढ़िवादिता, आर्थिक शोषण तथा राजनैतिक पराधीनता के परिवेश से सर्वहारा-वर्ग प्रभावित है, फिर उन्होंने अपने समग्र कथालोक को इन्हीं विसंगतियों-विद्रूपताओं पर केन्द्रित कर दिया था। प्रेमचन्द के बाद जितने भी कथाकार रहे, वे खण्ड-खण्ड मे जीते रहे; वादों मे सिमटकर रह गये। बहुसंख्य  कहानीकार जनसामान्य की वास्तविकता से हटकर मांसलवादी बनकर रह गये।"

श्री राघवेंद्र सिंह हजारी शासकीय महाविद्यालय हटा, दमोह (म०प्र०) मे हिन्दी-विभाग मे सहायक प्राध्यापक आशा राठौर ने बताया, "प्रेमचन्द एक व्यापक सामाजिक परिदृश्य को लेकर चले दिखते हैं, जबकि उनके पश्चात् के अधिकतर कथाकार व्यक्तिगत अनुभूतियों और दमित वासनाओं के प्रदर्शन की ओर उन्मुख होते हुए दिखायी देते हैं। साहित्य-रचना के नाम पर अति काल्पनिकता, घोर वैयक्तिकता तथा अति यथार्थवादिता का अनुसरण करनेवाले साहित्य को हम उच्च कोटि के साहित्य के अन्तर्गत स्थान नहीं दे सकते।"

 सेण्ट मेरी लुकस स्कूल ऐण्ड कॉलेज, प्रयागराज मे हिन्दी-प्रवक्ता और विचारक डॉ० धारवेन्द्रप्रताप त्रिपाठी ने बताया, "भाषा, शिल्प, कथानक, देशकाल, वातावरण, पात्रों की मनोवैज्ञानिकता, समाज के प्रति कथाकार का कर्त्तव्यबोध, पात्रों के चारित्रिक और व्यावहारिक गतिविधियों को स्पष्ट करने की जो क्षमता प्रेमचन्द मे दिखती है, उनके बाद की पीढ़ी मे  इतना स्पष्ट नहीं है।"

दिल्ली से साहित्यकार कल्पना मनोरमा ने कहा, "प्रेमचन्द के पास दूरदर्शिता थी और परपीड़ा महसूस करने की अनोखी शक्ति भी, तभी उन्होंने अपने समय से आगे देखते हुए, ठाकुर का कुआँ, पूष की रात, बूढ़ी काकी,बड़े भाई साहब, ईदगाह और कफ़न-जैसी कहानियाँ लिखीं, जो हिन्दीकथा- जगत् में मील का पत्थर साबित हुई हैं। किसानों की पीड़ा हो वा नौकरशाही की नुक्ताचीनी, उनके कथालेखन का हिस्सा रही थीं।"