अपराध के ‘विकास दुबे’ नामक अध्याय का अन्त !

आदित्य त्रिपाठी ‘यादवेन्द्र’ (प्रबन्ध निदेशक, IV24):

अपराध के विकास दुबे नामक अध्याय का अन्त… पर क्या यह वाकई अपराध का अन्त है, यह विचारणीय है? भले देर से ही सही परन्तु यूपी पुलिस ने एक अपराधी को मारकर अच्छा काम किया है और इसके लिए यूपी पुलिस को शाबाशी ।

असल में हम सब की एक समस्या है कि जब तक घाव नासूर नहीं बन जाता तब तक उसका उपचार हमें आवश्यक नहीं लगता । यह केवल विकास दुबे मामले में ही नहीं चाहे अंग्रेजों की गुलामी हो या मुगलों का शासन, हम तब तक सोते रहे जब तक समस्या अपने चरम पर न पहुंच गई हो । इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं क्योंकि हम सबकी ( वर्तमान में खाकी और ख़ादी ) यही फितरत है । आम आदमी से यदि धोखे से एक छोटा सा अपराध हो जाए तो पुलिस उसका जीना हराम कर देती है परन्तु विकास दुबे जिस पर 60 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं, वह बिना किसी भय के आराम से जिन्दगी जी रहा था । 17 साल से वह अपराध की दुनिया में सक्रिय था परन्तु पुलिस की भूमिका मात्र तमाशबीन के सिवाय और कुछ नहीं ।

खाकी और ख़ादी ने उसके हौसले इतने बलन्द कर दिए कि उसने आठ पुलिसकर्मियों को ही मौत के घाट उतार दिया । इससे पहले भी उसने भाजपा सरकार में दर्जा प्राप्त राज्य-मन्त्री की थाना में गोली मारकर हत्या कर दी थी, परन्तु भाजपा सरकार होने के बावजूद उस पर कोई असरदार कार्यवाही नहीं हुई, इससे दुःखद और क्या होगा ? जिस पुलिस विभाग का गठन आम आदमी की सुरक्षा और उसे भयमुक्त वातावरण देने के लिए किया गया था, वह स्वयं आज भय का पर्याय बन गई है । एक भला व्यक्ति थाना जाने से डरता है परन्तु अपराधी को कोई भय नहीं क्यों कि थाना में भले आदमी को गाली व प्रताड़ना और अपराधी को कुर्सी पेश की जाती है । जिन्हें जेल की हवा खिलानी चाहिए उन अपराधियों के इशारे पर कुछ पुलिसकर्मी मुजरा करते हैं । वर्तमान समय में पुलिस विभाग में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है ।