क्या नैतिक होना बुराई है?

समाज के उत्थान एवं उसके संवर्धन की पहली कसौटी ही “नैतिकता” है, अगर समाज नैतिक शून्य हो जाये तो समाज लोगों के समूह से तुरंत भेड़ की भीड़ से लेकर जंगली जानवर के झुण्ड समान हो जाता है, जहाँ नियम भी उसी का और नियत भी उसी का मान्य होता है जो सामर्थ्यवान होता है, जंगल में शेर राज करता है क्योंकि उसके पास सामर्थ्य है, और सोचिये कि समाज से नैतिकता शून्य कर दिया जाये तो हमने जलियावाला बाग नरसंहार भी पढ़ा है, समूचे विश्व के मध्यकाल में तलवार के बल पर तख़्त निर्धारण के इतिहास को भी पढ़ा है तो प्राचीन काल में शक, हुड़ से लेकर महमूद, चंगेज, तैमूर तक से लेकर सभ्यता के नाम पर लड़ रहे हैवानियत बरसाने वाले अंग्रेजों को भी पढ़ा है, और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हीरोशिमा और नागाज़ाकी पर परमाणु बम बरसाने वाले मानवधिकार का विश्वदरोगा बन बैठे संयुक्त राज्य के नैतिकता को भी पढ़ा है,

      महात्मा गांधी कहा करते थे कि नैतिक साधन से ही नैतिक साध्य की प्राप्ति कारगर है, "नैतिक" का बहुत ही संक्षेप अर्थ है यथा-
     "लोक व्यवहार हेतु नियत किया गया आचरण" एवं आचरण का अर्थ होता है "चरित्र" या "व्यवहार"!

  दशरथ नंदन राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम तक की यात्रा मूलतः "चरित्र" या "नैतिक" सीख का ही वह आदर्श स्वरुप है जो उत्तरवर्ती पीढ़ी और समाज के लिए अनुसरण के योग्य है, भगवान राम बड़ी से बड़ी मुशीबत में भी घबराते नहीं दिखते, भगवान राम के संदर्भ में अनैतिकता के समक्ष कहीं भी नैतिकता का परित्याग कर अनैतिक होने का प्रमाण नहीं मिलता अपितु श्री राम अंत तक रावण को नैतिकता के मार्ग पर आने का आगाह करते रहे, बाबा तुलसी ने चरित्र को ही केंद्र में रखकर दुनिया के सामने चरित्र के एक ऐसे उच्च आदर्श एवं शास्वत प्रतिमान को रख दिया जिसे आज हम बहुत ही आस्था एवं आदर से 'राम चरितमानस' कहते हैं 

   समाज में ज़ब-ज़ब नैतिक मूल्यों का अवसान हुआ है तब-तब कभी बेबस के कटोरे से रोटी के टुकड़े छीन कर नाली में बहा दिया गया है तो कभी प्लेग रोकने के नाम पर पूना प्लेग कमिश्नर मिस्टर रेंड और उसके साथी लेफ्टिनेंट एयर्स्ट पूना में प्लेग रोकने के नाम पर घर में जबरन घुसकर माँ-बहनों के आबरू को लुटते हैं, पर कोई था जिसकी आँखों में ये सब चुभ रहा था उसे ये सब अनैतिक लग रहा था जिनको इतिहास बहुत ही आदर के साथ चापेकर बंधु के नाम से संजोये रखा है,

  अब यहाँ हत्या करना 'अनैतिक' था या माँ-बहन की इज्जत लूटना 'अनैतिक' था इस पर संवाद दो खेमो में चलता ही रहेगा ठीक उसी तरह जैसे आज यह दलील दिया जा रहा है कि....

    "नैतिकता सिर्फ स्त्री के लिए क्यूँ?"

यह शब्द बहुत ही संवेदनशील तरीके से समाज के संवेदना के साथ खेलकर हिंसक समाज में तब्दील करने वाला ओछे चिंतन से उपजा एक प्रश्न है….
क्या नैतिक होना बुरी बात है?

  इस सवाल में कि नैतिकता सिर्फ स्त्री के लिए क्यूँ? यह चिंतन नहीं है, यह निजी लाभ हेतु बौद्धिक हथकंडे का प्रयोग कर चालाक़ी से एक एजेंडा खड़ा किया जा रहा है, यह कुंठा के ज्वालामुखी से उपजा एक प्रतिशोध है, और प्रतिशोध से समाज के संतुलन को सिर्फ बिगाड़ा जा सकता है, यह सवाल एकांगी है. इस सवाल में पुरुष निशाने पर है, इस सवाल में पुरुष के अनैतिक होने के भाव छिपे हैं, या फिर महिला को अनैतिक हो जाने कि सलाह है, जो कि निम्न स्तर की सोच और चिंतन है, यह नकारात्मकता की पराकाष्ठा है, भारतीय संस्कृति में महिला सदैव देवी के रूप में पूजी जाती रहीं हैं....

         'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः'...

को मानने वाले हैं हम भारतीय,सनातन धर्म में युग चाहे जो रहा हो पुरुष और स्त्री के स्वतंत्र वजूद की परिकल्पना कभी भी नहीं किया गया है, पर यह बात कहना कि नैतिकता सिर्फ स्त्री के लिए क्यूँ? यह स्त्री-पुरुष के बीच विलगाव का एहसास करा रहा है, यह एक खेमेबंदी का संकेत है,

यह इस बात को भी सिद्ध कर रहा है कि 'अपराध के खिलाफ अपराध' जैसे 'आँख के बदले आँख', पर हम हिन्दुस्तानी किसी के अनैतिक होने पर या तो उसे नैतिक बनाने, सच्चे मार्ग पर लाने का प्रयास करते हैं, जैसे प्रवचन एवं सत्संग, या फिर सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं, पर कोई भी धर्म ये नहीं सिखाता कि "नैतिकता सिर्फ स्त्री के लिए ही क्यूँ"? अगर पुरुष अनैतिक हो रहा है तो पुरुष के सामने महिला के नैतिक चरित्र का नजीर पेश करना चाहिए, पुरुष से ये उम्मीद करना चाहिए कि काश वो भी महिलाओं की तरह नैतिक बन सकें. पर समाज का सबसे अहम् कड़ी "नैतिकता" जो कि एक सभ्य समाज का श्रृंगार भी है उसी को महिलाओं द्वारा उतार फेंकने की अपील कहाँ तक समाज हित में है?

    नैतिकता और अनैतिकता के बीच बेहद बारीक फासला है पर इस बारीक फासले की नींव पर मानवीयता-अमानवीयता के बड़े से बड़े इमारत खड़े किये जा सकते हैं....

          भारतीय समाज सदाचार, विश्वास, ईमानदारी, त्याग और अध्यात्म पर टिका है, और आज भी निन्यानबे फिसदी महिलाएं आरगेज्म, चर्म सुख, भौतिक सुख एवं अन्य क्षणिक सुख से बहुत ऊपर हैं, सर्वे किया जाये तो यह बात स्पष्ट होगी कि आज भी भारतीय महिलाएं सिर्फ एक हमसफऱ की तलाश में रहती हैं जिनके साथ विश्वास, शुकून और उत्साह के साथ बूढ़ी हो सकें, इस कड़ी में समाज के सजग लेखकों, अभिभावकों एवं अध्यापक गण पर यह भारी जिम्मेदारी है कि वो हर आने वाली पीढ़ी को प्रेम, विश्वास और रिश्तों के अहमियत को समझा सकें, ताकि समाज को तोड़ने वाली मानसिकता रखने वाले प्रेम के नाम पर अश्लीलता, आज़ादी के नाम पर व्यसन तथाकथित स्वतंत्रता और आधुनिकता के नाम पर भावी पीढ़ी में व्यभिचार, अनैतिकता और अलगाव का बीजारोपण ना कर सकें...

   तथाकथित बौद्धिक वर्ग भावी पीढ़ी को आधुनिकता के नाम पर खेमे में बाँटने का पुरजोर प्रयास कर रही है, येभावी पीढ़ी को आज़ादी के नाम पर पेटेंट गुलाम बनाना चाहते हैं, और ज़ब इनका यदि खंडन करें तो ये सबसे संवेदनशील अंग पर चोट करते हैं,

   युवा अब प्रेम के अवधारणा को खुद से तलाश लेंगे,,,, प्रेम शास्वत है, और अब उस दौर में ज़ब बच्चियां बच्चों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दौड़ लगा रहीं हैं तो उनके दिमाग में आरगेज्म जैसे व्यसन को भरना कहाँ तक जायज है? जीवन का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है सेक्स, या संसर्ग पर उसी को केंद्र में रखकर अहम् बातों को चर्चा से बाहर कर देना एक प्रकार की संकिर्णता है, हमारे  शास्त्रों में तो इन सबसे बचने पर ही ज्यादा जोर दिया गया है? ब्रम्हचर्य के पालन पर आखिर क्यों हमारे शास्त्र गंभीर हैं? क्या वो साधु-महात्मा अज्ञानी थे?

युवा पीढ़ी अब पढ़ना चाहती है, लंबे सफ़र पर जाना चाहती है, तथाकथिक आजाद विचारधारा के नाम पर उनको कुंठित ना करना ही उनके और राष्ट्र के हित में होगा, अन्यथा सभ्य समाज की परिकल्पना कोरी कल्पना मात्र रह जायेगी, क्योंकि सकारात्मक सोच के आभाव में स्वस्थ समाज का निर्माण अप्रासंगिक साबित होगा!!!

        सुरेश कुमार राय 'चुन्नी'
        इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
          7905824502