क्या बाबा के इस आध्यात्मिक पाप का सहयोगी ये समाज नहीं है ?

 आशीष दीक्षित सागर बांंदा-


बाँदा से लेकर दिल्ली तक मीडिया में छाए बाबा वीरेन्द्र देव दीक्षित के लिए न देशभक्त आये और न कोई करणी सेना , बजरंग दल, शिवसेना । सैकड़ों लड़कियों को चरणदासी बनाकर रखने वाले बाबा सैकड़ो पटरानी रखना चाहते थे। जिस्मफरोशी का ये अध्यात्म बाँदा से दिल्ली तक पोषित रहा। करोड़ो रूपये दान में आये । था तो पूरा सफेद धन ही। न अपनी उम्र का ख्याल और न उस शक्ति का भय जिनके नाम पर इनकी दुकानें चलती है। समाज तब तक इन्हें मसीहा स्वीकार करता है जब तक कुकर्मों की कालिख खुलकर चेहरे पर न छप जावे। क्या बाबा की  इस आध्यात्मिक पापशाला का सहयोगी ये समाज भी नहीं है ?

सब वीरेंद्र देव दीक्षित को कोस रहे हैं, रामवृक्ष यादव याद है आपको जी हाँ वही मथुरा हिंसा वाला रामवृक्ष यादव । ये लड़कियो वाले एंगल पर मत जाइए, इस तरह की खबरों को बहुत सावधानी से इम्प्लांट किया जाता है, बताइये यदि हनिप्रीत न हो तो रामरहीम की स्टोरी में क्या दम रहा जाएगा । ऐसा भी नही है कि शोषण नही होता बिल्कुल शोषण होता है लेकिन इस तरह की घटना एक खास वक्त ही प्रकाश में आती है । सबसे पहले छोटे स्थानीय नेता इन्हें प्रश्रय देते है इन आश्रमों की आड़ में इनके काले कारनामे छिपे रहते है, ओर साथ ही साथ धर्म की जय भी होती रहती है, धीरे धीरे ये आश्रम अपनी संपत्ति बढ़ाते जाते हैं, बाबा फिक्सर की भूमिका में आ जाते हैं प्रशासन नतमस्तक हो जाता है, फिर बाबा को लगने लगता है कि वह बहुत प्रभावशाली हो गया है, इस बीच बेहिसाब दौलत ओर बड़ी बड़ी जमीने कब्जे में कर ली जाती है, इस खास पॉइंट तक आने का सब इंतजार करते हैं, फिर अचानक प्रेस में कुछ छपने लगता है कुछ रंगरेलियो के किस्से बाहर आते है फिर सौदे बाजी शुरू होती है, इस खेल में बाबा का हारना तो तय ही होता है हमेशा वो नेक्सस जीतता है जो उसके बाद आसानी से उस पूरी संपत्ति पर कब्जा जमा लेता है ।

चलिए वापस रामवृक्ष यादव पर लौटते हैं रामवृक्ष वाले किस्से में लड़की वाला फेक्टर सामने नही आया लेकिन रामवृक्ष यादव और वीरेन्द्र देव दीक्षित दोनों में एक चीज बहुत कॉमन है । दोनों ने अपनी मातृ संस्थाओं को चुनौती दी । रामवृक्ष यादव को अपने गुरु बाबा जयगुरुदेव के मरने पर बेहिसाब संपत्ति और आश्रम पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत की । उसे जयगुरुदेव के चेलो ने मारकर भगा दिया तो उसने मथुरा में अपना अलग आश्रम सरकारी जमीन पर बना लिया । प्रशासन के साथ हुए संघर्ष में वह मारा गया । रामवृक्ष यादव अपने गुरु जैसा पक्का खिलाड़ी नहीं था । वह अपनी बेवकूफी से मारा गया । वीरेन्द्र देव दीक्षित ने गुरु के मर जाने पर ब्रम्हाकुमारी संस्था पर अपना दावा पेश किया तो उसे बेइज्जत कर के भगा दिया गया । उसने ब्रम्हा कुमारी वाले ईश्वरीय विश्वविद्यालय के तर्ज पर आध्यात्मिक विश्वविद्यालय देश के अलग अलग शहरों में स्थापित किये, एक समानांतर संस्था खड़ी कर के वह चुनौती देने की पोजिशन में आ गया । किसी न किसी नेता या बड़ी हस्ती की सरपरस्ती उसे जरूर हासिल होगी । अभी वह गायब है, हो सकता है सामने आए हो या सकता है सामने न आए । लेकिन यह तय है कि उसका खेल खत्म हुआ, जैसे रामरहीम का खेल खत्म हुआ ।

रामरहीम की दौलत ओर संपत्ति कही न कही भी तो गयी होगी न ? बस वैसे ही इस खेल में भी होगा, और यकीन मानिए यही खेल आसाराम के साथ भी खेला गया है । नहीं तो कैसे संभव है कि यौन उत्पीड़न का आरोपी सालों तक जेल के बाहर ही नही आ पाए, जबकि अभी कुछ सिद्घ नहीं हुआ है । उसके खिलाफ देखा जाए तो केस है ही क्या आखिर उसके ट्रायल को इतना लटका कौन रहा है ? यह सिर्फ हम नही पूछ रहे यह सुप्रीमकोर्ट भी पूछ रही है ।
आप तो इस तरह के मामलों में बस एक बात याद रखिए कि जो दिखता है वो आपको दिखाया जाता है । ऐसा वास्तव में हो ऐसा जरूरी भी नही है । इस देश मे ऐसे हजारों बाबा और आश्रम हैं बस जिसका सत्ता के साथ बना संतुलन बिगड़ जाएगा उसका नम्बर पहले आ जाता है । नहीं तो कौन से बाबा के यहाँ जनता और नेताओं की भीड़ कम पड़ती है ?