‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

उच्चतम न्यायालय का एकपक्षीय और असत्यनिष्ठ दृष्टिकोण

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

देश की न्यायपालिका अपनी शुचिता खोती जा रही है; अपनी न्यायप्रियता की पारदर्शी नीति से पृथक् होती जा रही है। उसकी गतिविधियाँ जिस रूप में सार्वजनिक हो रही हैं, उनमें प्रकारान्तर से उसके सरकारीकरण का रूप दिखने लगा है। उच्चतम न्यायालय की एकपक्षीय निन्दनीय दृष्टि का एक उदाहरण समझिए :–

प्रयागराज में माघमेला के नाम पर बाहर से लाखों लोग को क्यों आने दिया जा रहा है? उच्चतम न्यायालय को सिंघु-सीमा पर आन्दोलनरत किसानों के लिए ‘कोरोना’ का भय है; परन्तु बाहर से प्रयागराज में आनेवाले लाखों लोग उसे दिख नहीं रहे हैं। इससे प्रयागराजवासियों के लिए ‘कोरोना-संक्रमण’ का भय बना हुआ है। न्यायालय की यह दोहरी नीति अति निन्दनीय है। इतना ही नहीं, लाखों की संख्या में लोग को बुलाकर चुनावी भाषणबाज़ी कर रहे ‘दोगले’ राजनेताओं के चरित्र-चाल-चेहरे उच्चतम न्यायालय को दिख नहीं रहे हैं?

उच्चतम न्यायालय ने किसानों की माँगों पर विचार करने के लिए उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में जिन चार सदस्यों की समिति का गठन कराया है, उसमें वे चारों सदस्य वही हैं, जिन्होंने विवादित तीनों कृषि-अधिनियमों के पक्ष में अपना समर्थन व्यक्त किया था; समाचारपत्रों में सरकार-द्वारा अवैधानिक रूप से पारित कराये गये तीनों कृषि-अधिनियमों की पक्षधरता पर अपनी सहमति व्यक्त की थी। ऐसे में, किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उक्त समिति का गठन किया गया है? वैसी समिति का गठन उच्चतम न्यायालय के ‘मानसिक और बौद्धिक पराधीनता’ का प्रतीक है। इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि उच्चतम न्यायालय सरकार के पक्ष में दिख रही है। ऐसे में, आन्दोलनरत किसानों को उक्त अन्यायप्रिय समिति से सम्बद्ध होकर अपने विषय और माँगों को प्रस्तुत करने का कोई औचित्य ही नहीं है। उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश बेवड़े की भूमिका सन्दिग्ध दिखती है; क्योंकि कृषि-अधिनियमों के विषय में किसानों की शिकायत को सुनने और सरकार की राय जानने के बाद न्यायालय को अपनी सिफ़ारिश देने के उद्देश्य से अपनी अध्यक्षता में उन्होंने भारतीय किसान युनियन के अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान, शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवत, दक्षिण-एशिया के अन्तरराष्ट्रीय खाद्यनीति एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक प्रमोद जोशी तथा कृषि अर्थशास्त्री एवं कृषि लागत और मूल्य आयोग के पूर्व-अध्यक्ष अशोक गुलाटी को सम्मिलित कर, अपनी शासकीय पक्षधरता को प्रकट कर दिया है। न्यायालय ने कहा है कि तीनों विवादास्पद कृषि-अधिनियमों– कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अनुबन्ध, अधिनियम २०२०, कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम २०२० तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम २०२० को अगले आदेश तक के लिए स्थगित किया जाता है।

यहाँ जो सर्वाधिक महत्त्व का विषय है, वह यह कि तीनों अधिनियमों पर विचार करते समय उच्चतम न्यायालय की सम्बन्धित पीठ के न्यायाधीशों ने इस विषय पर क्यों नहीं विचार किया था कि जिन विवादास्पद अधिनियमों को सरकार ने आनन-फानन में अधिनियम का रूप दिलवा दिया था, उन्हें पारित करवाने के लिए जिन प्रक्रियाओं का सहारा सरकार ने लिया था, वे वैध थे अथवा अवैध? उच्चतम न्यायालय की ओर से इस विषय का संज्ञान न करने पर पीठ के समस्त सम्बद्ध न्यायाधीशों की न्यायप्रियता सन्दिग्ध दिखने लगी है। ऐसे में, गठित उक्त समिति अपने कर्त्तव्य के प्रति कितनी सत्यनिष्ठ होगी, इसे आसानी से समझा जा सकता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ जनवरी, २०२० ईसवी।)